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पण्णासमो संधि पर वास्तव में वह विद्याधरी थी। बादमें वह किलकारी मारकर हमारे ऊपर ही दौड़ी। परन्तु (कुमार लक्ष्मणकी) तलवार सूर्यहास देखकर वह बैसे ही एकदम त्रस्त हो उठी मानो व्याध के तीरोंसे आहत कुरंगी हो । एक और विद्याधरन सिंहनाद किया,
और इस प्रकार मेरा अपहरणकर मुझे रामसे अलग कर दिया। फिर लक्ष्मण कहाँ राम कहाँ, और कहाँ यह दूतकार्य ! जान पड़ता है, कोई छलसे मेरा प्रियकर मेरा मन थाहना चाहता है ।। १.१०।।
[४] अच्छा, मैं तबतक इससे कुछ कौतुक करती हूं। देखू, यह क्या उत्तर देता है। (अपने मनमें यह सोचकर) सीतादेवी ने पूछा-"अरे मनुष्य होकर भी तुम इतने समर्थ हो ? आखिर तुमने लवण-समुद्र कैमे पार किया ? यदि तुम निःसन्देह रामके दूत हो तो तुमने समुद्र कैसे पार किया।हे वत्स ! वह (समुद्र) मगर और ग्राहों से भयंकर है, कच्छप, मच्छ और दक्षसे युक्त है। शिशुमारों, हाथियों और और मगरोंसे भरा हुआ है, सात सौ योजनके विस्तारवाला नित्य निगोदकी भाँति दुस्तर है। एक तो उसमें प्रवेश करना वैसे ही कठिन है, और फिर उसपर आसाली विद्या का परकोटा है। सचमुच ही, वह सारे संसारको तरह. या अपंडितके लिए विषम प्रत्याहारकी तरह अलंध्य है। इतनेपर भी उसका रक्षक, इन्द्र के समान, हर्षोत्फुल्ल वायुध है।
और तुमने युद्ध में कम्पिताधरा लेकासुन्दरीको किस प्रकार पराजित किया? इन सबसे बचकर, तुम उसी प्रकार लंकानगरी में प्रविष्ट हो गये, जिस प्रकार सिद्ध सिद्धपुरी में प्रवेश करते हैं ।।१-१०॥
[५] इन बहुमूल्य वचनोंको सुनकर हनुमानने हँसकर कहा, "हे परमेश्वरी! क्या अब भी आपको सन्देह है ? मैंने युद्ध में वज्रा