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________________ पउमचरित [४] से णिसुणे गिरिध विय-जहासाहिब म लि -जण ॥१॥ तेस वि सरहिं परजिउ साहणु। मग्गु स-हेमप्यछु हरिबाहगु ।।२।। परिणिय के विष्णु महा-वरु। चवह अउजापुर · परमेसरु ॥३॥ 'सुन्दरि मग्गु मग्गु जं रुचई। सुहमइ-सुयएँ णवेपिणं कुबइ ॥४। "दिष्णु देव पहै मग्गमि जइयहुँ । णियय-सच्चु पालिजह तहपहुँ' ।।५|| एम घयन्त धण-कण-संकुलें। थियइँ वि पुरे कवतुकमाल ॥६॥ बहु - वासरें हिं अउज्म पइटहै। सइ-धासव इव रमें पट्टिद् ॥७॥ सयल-कला-कलाव-संपण्णा। साम घयारि पुत उप्पण्णा ।।८।। पत्ता रामचन्दु अपरजियाँ सोमिसि सुमित्तिहें एक्कु जणु । भरहु धुरन्धरु केकहँ सुष्पहहें पुनु पुणु सत्हणु ॥९|| एय चारि पुन तहों रायहाँ। गाई महा-समुष्ट महि-भायहाँ ॥१॥ णा दम्त गिष्याण-गइन्दहाँ। पाई मणोरह सज्मण-विन्दहाँ ।।२।। जाउ वि मिहिला-गयर पइवर। समउ विदेहएँ रज्जें णिविट्ठउ ।।३।। प्ताहूँ विहि मि वर-विमम-वीयउ। मामण्डल उप्पण्णु स-सीयउ ।।॥ पुष्व-वाह समर वि अ-खेवें। दाहिण सेटि हरवि जिउ देखें ।।५।। तहिं रहणंउरचक्वाल-पुर। पहल-धवल-गुह-पङ्कापण्डरें ।।६।। चन्दगद्दे चम्बुज्जल-वयणही। णदणषण-समीवें तहाँ सयणहाँ ॥७॥ घत्ति पिझस्टेण अमरिन्दें। पुष्फवाइहें अलविउ गरिन् ॥८॥ तात्र रजु जणयहाँ तणा उहा महा-वासिऍहिं । बष्वर-सवर-पुलिन्दएँ हिँ हिमवन्त- विह-संवासिहि ॥९॥
SR No.090354
Book TitlePaumchariu Part 2
Original Sutra AuthorSwayambhudev
AuthorH C Bhayani
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year
Total Pages379
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size6 MB
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