SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 86
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ "ऐसे क्यों घूर रहे हैं?" शान्तलदेवी ने पूछा। "हमारी पी महादेदी सुखरल में निपुग हैं। उन्हें भी भय ? यही हमें आश्चर्यचकित कर रहा है।" "राष्ट्र हित के किसी काम को भय की संज्ञा नहीं दी जा सकती। सन्निधान छोटी रानी के पास जाएँ तो बड़ी रानियाँ बुरा मानेगी, यह डर यदि सन्निधान के मन में हो तो उसका कोई कारण नहीं।" "पट्टमहादेवी की बात हम जानते हैं।' "बम्मलदेवी साथ ही रहीं। अब रहीं राजलदेवी । सन्निधान उन्हें साथ ले लें।" "सोचेंगे।" कहकर बिट्टिदेव उठ खड़े हुए। शान्तलदेवी ने घण्टी बजायी। किवाड़ खुले। नौकरानी ने अन्दर प्रवेश किया तो बिट्टिदेव ने कहा, "कुछ नहीं" वह किवाड़ लगाकर चली गयी। बिट्टिदेव चहल-कदमी करने लगे। शान्तलदेवी की ओर नहीं देखा। शान्तलदेवी यह सब देख रही थी। फिर बोली, "सन्निधान के उठ खड़े होने से समझा कि जाने लगे हैं, इसलिए मैंने घण्टी बजायी थी। क्षमा करें।" "शायद पट्टमहादेवी से हमें ही क्षमा मांगनी पड़ेगी।" "क्यों? सन्निधान दूसरों से क्षमा तो नहीं माँगते!" "ऐसा ही है। तुम्हें क्षमाशील जानकर ही हमने दो बड़ी गलतियों की हैं। इसकी पूरी जानकारी हमें हो गयी हैं।" "मुझे ऐसा तो कुछ भी नहीं लगा!" । "हमने जो गलती की, उसका दण्ड हम ही तो भोग रहे हैं।" "ऐसा कौन-सा दण्ड है?" "देवि! यह कहना मुश्किल है। उसी का फल है कि निकट होते हुए भी ऐसा लगता है कि तुम दूर चली गयी हो। और हम अतृप्त रह गये हैं।" "यह सत्र केवल मन के विकार हैं।" "ऐसा नहीं है, देवि! अपनी अतृप्ति के लिए हम स्वयं ही कारण हैं।" "ऐसी बातों को मन में स्थान देने पर यही सब होता है।" "देवि! तुमने हमारे दूसरे विवाहों के लिए सम्मति क्यों दी? और तुमने अपने को हमसे दूर क्यों कर लिया?" मैं दूर कभी नहीं हुई। मैं निकट ही हूँ। मेरे हृदय में अकेले आप ही प्रतिष्ठित "तो हमें जो इच्छा होती है, वह तुम्हें क्यों नहीं होती?" "कौन-सी? "इस समय पूर्वसूचना के बिना हम आये, तो भी मालूम नहीं हुआ?" 00:: पट्टमहादेवी शान्तला : भाग चार
SR No.090352
Book TitlePattmahadevi Shatala Part 4
Original Sutra AuthorN/A
AuthorC K Nagraj Rao
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year
Total Pages458
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Biography, & History
File Size9 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy