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गयी। उनका किस्सा सुनकर सोचा था कि उनसे मुझे मदद मिल जाएगी। कुछ फायदा नहीं।' पर आगे की चाल सोचने से उसने अपने आपको रोका नहीं । बेटी की बात का उस पर कोई असर नहीं जड़ा। सोचमग. सारे माना है !
तीनों रानियों में यह कौतूहल रहा कि न जाने रानी लक्ष्मीदेवी के मन में क्या है, उसका स्वभाव कैसा है। उम्र छोटी; सुन्दर है; शारीरिक गठन भी अच्छा है, सलोनी है। बाहर से सब ठीक है। मगर उसका अन्तर कैस्स है ? तीनों के सामने यही प्रश्न था।
रानी पद्मलदेवी ने ही बातचीत आरम्भ की। साधारण विषय से बात उठी तो वह विषयान्तर होकर कहीं-की-कहीं पहुंच गयी। लक्ष्मीदेवी के पूर्व वृत्तान्त को जान ही नहीं सकी। फिर भी, उन्हें लगा, उसे महाराज से अपार प्रेम हैं। उनसे डरती भी है। पट्टमहादेवी का वह सम्मान करती हैं। दूसरी रानियों के विषय में उसने कोई विचार नहीं किया है। पिता के प्रति वह कृतज्ञ है, फिर भी उसकी सब बातों को मान लेना नहीं चाहती । कुल मिलाकर उसका मन एक तरह से डांवाडोल है। उसे अपने तईं छोड़ दें तो वह राजमहल के वातावरण में खप सकती है। परन्तु बार-बार कान भरते रहने पर उसकी बुद्धि किस तरफ मुड़ेगी, कहा नहीं जा सकता, आदि-आदि विचार, उससे हुई बातचीत के फलस्वरूप, पद्मलदेवी के मन में उठने लगे। पद्मलदेवी ने यह भी सोचा कि जब तक वहाँ रहेंगी तब तक उसे समझा-बुझाकर उसके मानसिक संघर्ष को कुछ कम करना होगा।
यहाँ से विदा होकर राजमहल के नव-विस्तारित भागों को देखती हुई वह आगे बढ़ी कि इतने में रानी बम्पलदेवी, रानी राजलदेवी, दोनों के लौट आने की खबर मिली। उन्हें देखकर कुशलक्षेम पूछने के बाद वे अपने विश्रामागार की ओर चल दी। पट्टमहादेवी जी के साथ ही सूर्यास्त के पूर्व, उन सबका भोजन भी हुआ, उस दिन किसी को भी आराम करने के लिए समय ही नहीं मिला। प्रतिष्ठा-महोत्सव दूसरे ही दिन होने वाला था, इसलिए सभी व्यस्त थे।
सुबह तड़के ही महाराज और पट्टमहादेवीजी को मांगलिक स्नान भी करना था। माचिकाने और प्रधानजी की धर्मपत्नी लक्कलदेवी ने शास्त्रोक्त रीति से अभ्यंजन विधि को सम्पन्न किया। दूसरी रानियों से भी मंगलस्नान करने का अनुरोध किया गया।
मंगलस्नान के पश्चात् आचार्य द्वारा प्रेषित शुभ्र, नूतन वस्त्र धारण कर राजदम्पती देवमन्दिर की ओर चलने को तैयार हुए। मंगलवाद्य बजने लगे। सारी वेलापुरी मंगलवाद्यध्वनि से गूंज उठी। जात-पात का भेदभाव भूलकर, वेलापुरी की सारी जनता स्नानकर, शुभ्र वस्त्र धारण कर, मन्दिर की ओर जाने लगी। वेलापुरी में उत्साह-हो-उत्साह दीख रहा था। सारा नगर सर्वत्र गली-कूचों तक बन्दनवार, अल्पना, रंगवल्ली आदि से सजकर जगमगा रहा था मानो भूमाता ने अपनी सारी प्रसाधन सामग्री को वेलापुरी में ही बिखेर दिया हो। पिछले दिन, सूर्यास्त के समय से ही मन्दिर में नूतन विग्रह का
32 :: पट्टमहादेवी शान्तला : भाग चार