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________________ " शायद दिल्ली से शहजादी आयी होंगी। उसके लिए विशेष व्यवस्था कराने बुलाया होगा ।" "तुम भ्रम में पड़ो हो । दिल्ली कहाँ ? बादशाह की बेटी कहाँ ? यादवपुरो कहाँ ? हमारे भगवान से उसका प्रेम ? यह सब कभी सम्भव है, बेटी ?" "परन्तु उस दिन पेरुमलैजी ने भरी सभा में कहा था न ? वे झूठ कह सकते हैं ?" " देखी बेटी, यह सब व्यावहारिक विषय है। शिवालय की नीव - स्थापना की बात आचार्यजी को पसन्द नहीं थी। वह नहीं चाहते थे कि नींव स्थापना उनके हाथ से हो। साहस के साथ वह महाराज से कह सकते थे। ऐसा कहने पर महाराज के क्रोध का भाजन बनना पड़े, इससे बचने के लिए यह एक बहाना था। अच्छा, जाने दो। हम भी उस अवांछित समारम्भ से छूट आये न वही काफी है।" 'समारम्भ से छूटे तो सही । परन्तु जब मैंने पट्टमहादेवी से यादवपुरी जाने की अपनी बात कही तब उन्होंने मुझसे रह जाने को कहा। मगर सन्निधान ने इस बारे में कुछ नहीं कहा, कहते ही मान गये और ऐसा कह दिया मानो मेरा चले जाना उनको अच्छा लग रहा हो। कम-से-कम यह भी नहीं कहा कि नींव स्थापना के बाद जाओ । किसी ने मेरे प्रति उनका दिल खट्टा कर दिया है। " "कोई क्या ? वही, परमधूर्ता पट्टमहादेवी है न? यह उसी का काम है।' "नन, ऐसा नहीं हो सकता। वास्तव में उन्हें मेरे प्रति स्नेह है।" "तुम मूर्ख हो, इसलिए ऐसा समझती हो। तुमको मालूम नहीं होता। उसे पहले से तुम पर और मुझपर अविश्वास है मुझ पर, और तुम पर भी, गुप्तचर लगा रखे हैं। मैंने ऐसा कौन-सा घातक काम किया ?" 41 - 44 पर हम पर शंका क्यों ?" 41 और कुछ नहीं, उन्हें हमारे इस श्रीवैष्णव लांछन से ही द्वेष हैं। कल तुम एक लड़के की माँ बनोगी, वह भी उसके बच्चों के साथ सिंहासन के लिए स्पर्धा करेगा, यही उसका भय है। इसलिए अभी से इस मत द्वेष को हवा देकर बढ़ा रही है। देखो बेटी ! इस संकर जाति में पैदा होनेवालों की हालत ही ऐसी होती है। उसका बाप शैव, माँ जैन। उसका किस्सा बहुत गहरा हैं। तुम्हें क्या मालूम ? उसकी इच्छा थी कि उसके पति को हो राज्य मिले।" 45 'सुना है कि महामातृ श्री को वह बहुत प्यारी थीं। ऐसी अभिलाषा होती तो बड़े राजकुमार से ही विवाह कर सकती थीं न?" H 'परन्तु उन्हें भी तो स्वीकार करना था न ? उनका दिल तो लगा था महादण्डनायक की बेटी पर। इसीलिए सहजात बहनों में सौतेली डाह पैदा करके इसने बल्लाल महाराज की जिन्दगी को ही बरबाद कर दिया। महाराज बल्लाल की बरबादी का कारण इसका यहीं सौतिया डाह है। बहुत ही चिकनी-चुपड़ी बातें करके एक-दूसरे 164 :: पट्टमहादेवी शान्तला : भाग चार
SR No.090352
Book TitlePattmahadevi Shatala Part 4
Original Sutra AuthorN/A
AuthorC K Nagraj Rao
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year
Total Pages458
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Biography, & History
File Size9 MB
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