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________________ प्रभु एरेयंग में जा आरा की "वास्तुम इनकी , मारने सेना नायकों में, सुनते हैं, ये बल्लवेग्गड़ेजी बहुत होशियार हैं। साहणीयों में भी, सुनते हैं, ये दोनों बड़े बुद्धिमान् है । वे भी मौजूद हैं। आपके आने से पहले इसी विषय पर बात चल रही थी। तब बल्लवेग्गड़े ने बताया था कि सभी सेनानायकों, पटवारियों और अश्वनायकों को बुलाकर विचार-विनिमय करना अच्छा होगा। अगर आप भी सहमत हों तो वैसा ही करेंगे।" एरेयंग ने कहा। ___ दण्डनायक राविन भट्ट ने एकदम कुछ नहीं कहा। उनके मन में आया कि मेरे आने से पहले, मुझसे विचार-विनिमय करने से पूर्व मेरी ही सेना के तीन लोगों को बुलवाने में कोई खास उद्देश्य होना चाहिए, उद्देश्य कुछ भी हो, ऐसे प्रसंग में अधिक लोगों का न रहना ही ठीक है, इसीलिए एरेयंग प्रभु ने ऐसा किया होगा। बोले, "अन्न हम पाँच लोग विचार-विनिमय कर लें; कोई हल न निकला तो तब सोचेंगे कि और किस-किसको बुलवाना चाहिए।" एरेयंग प्रभु ने प्रशंसा की दृष्टि से चालुक्य दण्डनायक की ओर देखा। "किस किसके द्वारा बड़ी रानी का अदृश्य होना सम्भव हुआ है, इस सम्बन्ध में आपको कुछ सूझ रहा है, दण्डनायकजी?" दण्डनायक राविनभट्ट ने कहा, "हो सकता है कि किसी कारण से बिना बताये वे खुद अदृश्य हो गयी हो।" "यो अदृश्य हो जाने में उनका उद्देश्य होना चाहिए न?" एरेयंग ने प्रश्न किया। "हाँ, यों अदृश्य हो जाने में उनका उद्देश्य कुछ नहीं होगा अतः वे स्वयं प्रेरणा से तो कहीं गयी न होगी।" "किसी की आँखों में पड़े बिना यों चले जाना भी कैसे सम्भब हुआ? यह तो सैन्य शिविर है। रात-दिन लगातार पहरा रहता है। सब ओर पहरेदारों की नजर रहती है।" बल्लवेग्गड़े ने कहा। "समझ लें कि जिन्होंने देखा उनका मुँह बन्द करने के लिए हाथ गरम कर दिया गया हो, तब क्या हमारी संरक्षक सेना में ऐसे भी लोग हैं ?" एरेयंग ने सवाल किया। राविनभट्ट ने धड़ल्ले से कहा, "चालुनयों की सेना में ऐसे लोग नहीं हैं।" "आपकी सेना ने आपके मन में ऐसा विश्वास पैदा कर दिया है तो यह आपकी दक्षता का ही प्रतीक है, यह तो सन्तोष का विषय है। लेकिन क्या आपका यह अनुमान है कि बनवासियों, पोय्सलों, करहाटों की सेना में ऐसे लोग होंगे?" "यह मैंने अपने लोगों के बारे में कहा है। इसका यह मतलब नहीं कि मुझे दूसरों की सेनाओं पर शंका है।" "करहाट की बात आयी; इसलिए मुझे कुछ कहने को जी चाहता है। कहूँ? यद्यपि वह केवल अनुमान है।" बल्लवेग्गड़े ने कहा। 150 :: पट्टमहादेवी शासप्ला
SR No.090349
Book TitlePattmahadevi Shatala Part 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorC K Nagraj Rao
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year
Total Pages400
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Biography, & History
File Size8 MB
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