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________________ -25:१-२५] १. चोपदेशास्तम् ताधिक्य पथि निपतिता' यत्किरत्सारमेयात् अपने मूर्च मधुरमधुरं भाषमाणाः पिबन्ति ॥ २२ ॥ 23) या खादन्ति पल पिबन्ति यमुर्रा जस्पन्ति मिथ्यापथः नियन्ति प्रषिणार्थमेष विदघस्यर्षभतिष्ठाम सिम् । नीचानामपि तुरषकमनसः पापात्मिका कुर्वते लालारानमहर्निशं न नरक वेश्या विहायापरम् ॥ २३ ॥ 24) रजकशिलासहशीमिः कुकुरकर्परसमानचरितामिः। गणिकामियदि संगः कृतमिह परलोकवार्वाभिः ॥ २४ ॥ 25) या दुर्दे कविता पममधिवसति त्रातुसंवन्धहीना। मीतिर्यस्यां स्वभाषाइशनवृतमा नापराधं करोति । सत्र मद्यपाने । अन्यत् आधिक्यं वर्तते । पचि मार्गे निपतिता (1) अनानाम् । वस्ने मुखे । सारमेयात्किरन्मयम् । मधुरमधुर मि मिष्ठं भाषमाणाः पिबन्ति ॥ २२ ॥ वेश्या विहाय अपरं नरकं न वर्तते । याः पले मांस खादन्ति । च पुनः । सुरो मदिरा पिवन्ति । या वेश्माः मिथ्यावचः असल्य जल्पन्ति । या केश्याः द्रविणार्थ द्रव्यार्थ द्रव्ययुकं पुरुषम् । नियन्ति मेई कुर्वन्ति । एव निधयेन । या वेश्याः अयप्रतिष्ठाक्षति अर्थप्रतिष्ठाविनाशं कुर्वन्ति । या वेश्या बइनिर्श दिवारात्रम् । लालापान कुर्वते । फेवाम् । नाचानामपि । किंलक्षणा: वेश्याः। टूरवकमनसः मतिशयेन वक्रमनसः । पुनः किंलक्षणाः वेश्याः। पापालिकाः। इति हेतोः। वेश्यां विहाय त्यक्त्वा अपर नरकंन । किन्तु वेश्या एव भरकम् ॥ २३ ।। इह लोके संसारे। यदि चेत् । गणिकामिः वेश्याभिः । संगः कुतः. तदा परलोकवार्तामिः त पूर्यता (1) पूर्णम् । कि लक्षणाभिः वेश्यामिः। रक्षिलासहशीभिः पूरैकरसमानचरिताभिः ॥ २४ ॥ मनु महो । अस्मिन् आवेटे । रताना बीवानाम् । अद्विरूप यत्पापम् इह लोके भवति तस्पाप केन वर्ण्यते । अधिकं पाप किमु न भवति । अप्ति तु बहुतर पाप भवति । अन्यत्र परजन्मनि कि पाप न भवति । अपि तु भवति । रसियाकेटे । मांसपिणाप्रोमाद मा सुगवनिता हरिमी अपि । बलम् अत्यर्थम् । वभ्या हन्सव्या। यह तो दूर रहे। किन्तु अधिक खेदकी बात तो यह है कि मार्गमें पड़े हुए उनके मुखमें कुत्ता मूत देता है और में उसे अतिशय मधुर बतलाकर पीते रहते हैं ॥ २२॥ मनमें अत्यन्त कुटिलताको धारण करनेवाली जो पापिष्ठ वेश्यायें मांसको खाती हैं, मद्यको पीती हैं, असत्य वचन बोलती हैं, केवल घनप्राप्तिके लिये ही कह करती है, धन और प्रतिष्ठा इन दोनोको ही नष्ट करती है, तथा बो पेल्मायें नीच पुरुषोंकी मी लारको पीती हैं उन वेश्याओंको छोड़कर दूसरा कोई नरक नहीं है, अर्थात् थे वेश्यायें नरकगतिप्राप्तिकी कारण हैं ॥ २३ ॥ जो वेश्यायें धोषीकी कपड़े धोनेकी शिलाके समान हैं तथा जिनका आचरण कुरोके कपालके समान है ऐसी वेश्याओंसे यदि संगति की जाती है तो फिर यहा परमयकी बातोंसे बस हो ।। विशेषार्थ-जिस प्रकार घोबीके पत्थरपर अच्छे बुरे सब प्रकारके कपड़े पोये जाते हैं तथा जिस प्रकार एक ही कपालको अनेक कुत्ते खींचते हैं उसी प्रकार जिन वेश्याओंसे ऊंच और नीच सभी प्रकारके पुरुष सम्बन्ध रखते हैं उन वेश्याओंमें अनुरक्त रहनेसे इस भवमें धन और प्रतिष्ठाका नाश होता है तथा परभक्में नस्कादिका महान् कष्ट भोगना पड़ता है। अत एव इस भव और पर मैक्में आत्मकल्याणके चाहनेवाले सत्पुरुषोंको वेश्याव्यसनका परित्याग करना ही चाहिये ॥ २४ ॥ जो हरिणी दुःखदायक एक मात्र शरीररूप धनको धारण करती हुई वनमें रहती है, रक्षकके सम्बन्धसे रहित है अर्थात् जिसका कोई रक्षक नहीं है, प्रतिपाठोध्यम् । मका निपतिता। ५७ पूर्ण नास्ति। न कुबरकुकर। कुकर, ब अक्कार, परजन्मनि पाप। ८ पर। सरसा। ४मक अदनिश लालापानम् । मपि तु अई।
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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