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________________ -14:१-२४] १. धर्मोपदेशामृतम् तत्त्वाभ्यासः स्वकीयबतरतिरमले दर्शनं यत्र पूज्य समाईस्थ्य बुधानामितरदिह पुमर्दुम्खदो मोहपाशः ॥१३॥ 14) आदी पर्शनमुन्नत प्रतमितः सामापिकं प्रोषेष स्यागष सचित्तवस्तुनि दिवाभुकै तथा ब्रह्म च । नारमोद परिणाहो ऽन्नुमसिनोद्दिष्टमेकादश स्थामानाति गृहिवते व्यसमितास्यागस्तवापः स्मृतः ॥ २४॥ क्रियते । यत्र गृहपदे अमलं दर्शनं भवति । तद्गाहपद पुरैः पूज्यम् । पुनः इतरत् द्वितीय क्रियादानरहितं गृहपदं दुःखदः मोहपाशः ॥ १३ ॥ गहिवते गृहस्थधर्म इति एकादशस्थानानि सन्ति । धर्मार्थ सान्येव दर्शयति । भादौ प्रपमतः । दर्शन दर्शनप्रतिमा १। इतः पश्चात् ब्रतं व्रतप्रतिमा । सतः सामायिकं सामायिकप्रतिमा ३ । ततः प्रोषध प्रोषधोपदासप्रतिमा ४ र पुनः । एष निश्चयेन । सपित्तरखनि त्यागः ५। ततः विवाभुकं रात्री स्त्री असेच्या (1) ६ । तथा ब्रह्म ब्रह्मचर्यप्रतिमा । मारम्भो न । परिग्रहो न । अनुमतिर्न १० । उहि न 111 हिधर्म एकादश स्थानानि कचितानि । तासां प्रतिमाना आधखदायः व्यसनिता जाता है वह गृहस अवस्था विद्वानोंके लिये (पूज्य ) पूजनेके योग्य है। और इससे विपरीत गृहख अवस्था यहां लोकमें दुःखदायक मोहजाल ही है ॥ १३॥ सर्वप्रथम उन्नतिको प्राप्त हुआ सम्यग्दर्शन, इसके पश्चात् त, तत्पश्चात् क्रमशः सामायिक, प्रोषधोपवास, सचित्त वस्तुका त्याग, दिनमें भोजन करना अर्थात् रात्रिभोजनका त्याग, तदनन्तर चर्यका धारण करना, आरम्भ नहीं करना, परिग्रहका न रखना, गृहस्पीके कार्योंमें सम्मति न देना, तथा उद्दिष्ट भोजनको ग्रहण न करना; इस प्रकार ये आपकधर्ममें म्यारह प्रतिमायें निर्दिष्ट की गई है। उन सबके आदिमें भूतादि दुर्व्यसनोका त्याग स्मरण किया गया है अर्थात् बतलाया गया है ।। विशेषार्थ- सकलचारित्र और विकलचारित्रके मेदसे चारित्र दो प्रकारका है। इनमें सकलचारित्र मुनियोंके और विकलचारित्र श्रावकोंके होता है। उनमें श्रावकोंकी निम्न म्यारह श्रेणियां (पतिमायें) हैंदर्शन, व्रत, सामायिक, प्रोषधोपवास, सचिचत्याग, दिवामुक्ति, ब्रह्मचर्य, आरम्भत्याग, परिग्रहत्याग, अनुमतित्याग और उद्दिष्टत्याग । (१) विशुद्ध सम्यग्दर्शनके साथ संसार, शरीर एवं इन्द्रियविषयभोगोंसे विरक्त होकर पाक्षिक श्रावकके आचारके उन्मुख होनेका नाम दर्शनप्रतिमा है। (२) माया, मिथ्या और निदानरूप तीन शस्योंसे रहित होकर अतिचार रहित पांच अणुव्रतों एवं सात शीलवतोंके धारण करनेको व्रतमतिमा कहा जाता है । (३) नियमित समय तक हिंसादि पांचों पापोंका पूर्णतया त्याग करके अनित्य व अशरण आदि भावनाओंका तथा संसार एवं मोक्षके स्वरूप आदिका विचार करना, इसे सामायिक कहते हैं। तृतीय प्रतिमाधारी आवक इसे प्रातः, दोपहर और सायंकालमें नियमित स्वरूपसे करता है। (४) प्रत्येक अष्टमी और चतुर्दशीको सोलह पहर तक चार प्रकारके भोजन ( अशन, पान, खाध और लेड) के परित्यागका नाम प्रोषधोपवास है। यहां प्रोषध शब्दका अर्थ एकाशन और उपवासका अर्थ सच प्रकारके भोजनका परित्याग है । जैसे- यदि अष्टमीको प्रोषधोपवास करना है तो सप्तमीके दिन एकाशन करके अष्टमीको उपवास करना चाहिये और तत्पश्चात् नवमीको भी एकाशन ही करना चाहिये । प्रोषधोपवासके समय हिंसादि पापोंके साथ शरीरश्रृंगारादिका मी त्याग करना अनिवार्य होता है । (५) जो वनस्पतियां निगोदजीवोंसे व्याप्त होती हैं उनके त्यागको सचित्तत्याग कहा जाता है । (६) रात्रि में भोजनका परित्याग १ श प्रौषधः । १४ क दिवाभवम् ।
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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