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________________ [३:१-३ पवनन्दि-पञ्चविंशतिः 3) रागो यस्य न विपते कचिवपि प्रध्वस्तसंगमहात् अनादेः परिवर्जनाच पदुषो ऽपि संभाव्यते । तस्मात्साम्यमथात्मबोधममतो जातः यः कर्मणा मानन्दादिगुणाश्रयस्तु नियतं सोऽहम्सदा पातु वः ।। ३ ।। 4) इन्द्रस्य प्रणतस्य शेखरशिवारलाभासा नख श्रेणीतेक्षणविपशुम्भवालिसाहूरोलसपाटलम्। maraman यस्य जिनस दृशोः नेत्रयोः किंचिद् दृश्यं नास्ति । तेन हेतुना। नासाडष्टिः नासाग्रे मारोपितष्टिः । यस्य जिनस्य कर्णयोः किमपि प्रोतव्यं न मस्ति । तेन हेतुना। रह एकान्ते । प्राप्तः । पुनः मिलक्षणो जिनः । अविनिराकुलः भाकुलतारहितः । पुनः कथंभूतो जिनः। ध्यानकतानः याने एकाप्रपितः । एतादृशः जिनः विजयते इत्यर्थः ॥ २ ॥ स भईन् जिनः । वः युष्मान् । सदा । पातु रक्षतु । यस्य जिनस्य । नियत निश्चितम् । कतिदपि । रागो न विद्यते । कस्माद् । प्रभवस्तसंगमहात् प्रवस्तः स्फेटित': संप्रहः पिशाचः यत्र तस्मात् परिमहरयजनात् ।।यस्य जिनस्य सुदेषोऽपि न समाध्यते । कस्मात् । अखादा परिवर्जनात् अवरहितत्वात् । तस्मात् रागद्वेषाभावात् साम्यं जातम् । साम्मारिक जातम् । आत्मयोपनं जातम् । भतः आत्मबोधनात् कि जातम् । कर्मणां क्षयो जातः । कर्मणां क्षयाकिं जाता। भानन्दादिगुणाश्रयः जातःआमन्दादिगुणाना आधयः स्थानम् । एवंभूतः जिनः वः युष्मान् पातु सदा रक्षतु ॥३॥ जिनस्य वीतरागमा । भणियुग चरणकमलयुगम् । न अस्माकम् । चेतोऽर्पित वित्त अर्पित मनति स्थापितम् । शर्मगे सुखाय भवतु । कथंभूतम् प्रियुगम् । जाम्यहरं जहस्य भाषः जा मूर्खस्वस्फेटकम् । पुनः किलक्षणम् । अम्भोजसाम्यं दधत् कमळ्याहस्य दपदा पुनः किलक्षणम् । रजस्यक रजसा त्यक रजस्त्यणम् । अपि निषितम् । पुनः किंलक्षण चरणयुगम् । श्रीसद्म श्रीः लक्ष्मीपाश्रीः शोभा तस्याः लक्ष्म्याः गई तथा तस्याः शोभायाः गृहम् । पुनः किलक्षणम् । प्रणतस्प चित्त हुए जिन भगवान् जयवन्त होवें ॥ विशेषार्थ- अन्य समस्त पदार्थोकी ओरसे चिन्ताको हटाकर किसी एक ही पदार्थकी ओर उसे नियमित करना, इसे ध्यान कहा जाता है । यह ध्यान कहीं एकान्त स्थानमें ही किया जा सकता है । यदि उक्त ध्यान कार्योत्सर्गसे किया जाता है तो उस अवस्थामें दोनों हाथोंको नीचे लटका कर दृष्टिको नासाके ऊपर रखते हैं। इस ध्यानकी अवस्थाको लक्ष्य करके ही यहां यह कहा गया है कि उस समय जिन भगवानको न हाथोंसे करने योग्य कुछ कार्य शेष रहा था, न गमनसे प्राप्त करनेके योग्य धनादिककी अभिलाषा शेष थी, न कोई भी दृश्य उनके नेत्रोंको रुचिकर शेष रहा था, और न कोई गीत आदि भी उनके कानोंको मुग्ध करनेवाला शेष रहा था ॥२॥ जिस अरहंत परमेष्ठीके परिग्रह रूपी पिशाचसे रहित हो जानेके कारण किसी मी इन्द्रियविषयमें राग नहीं है, त्रिशूल आदि आयुधोंसे रहित होनेके कारण उक्त अरहंत परमेष्ठीके विद्वानोंके द्वारा द्वेषकी भी सम्भावना नहीं की जा सकती है । इसीलिये राग-द्वेपसे रहित हो जानेके कारण उनके समताभाव आविर्भूत हुआ है, और इस समताभावके प्रगट हो जानेसे उनके आत्मावबोध तथा इससे उनके कर्मोंका वियोग हुआ है । अत एवं कर्मोक क्षयसे जो अर्हत् परमेष्ठी अनन्त सुख आदि गुणोंके आश्रयको प्राप्त हुए हैं वे अर्हत् परमेष्ठी सर्वदा आप लोगोंकी रक्षा करें ॥३॥ जो जिन भगवान्के श्रेष्ठ उभय चरण नमस्कार करते समय नम्रीभूत हुए इन्द्र के मुकुटकी शिखामें बड़े हुए वरूपी सूर्यकी प्रभासे कुछ धवलताके साथ लाल वर्णवाले हैं, तथा जो नवपंक्तियोंमें प्राप्त हुए इन्द्रके नेत्रप्रतिबिम्वरूप प्रमरोंको धारण करते हैं, तथा जो शोभाके स्थानभूत हैं, इसीलिये जो कमलकी उपमाको १श किंचिए दृश्यं न द्रष्ट योग्य। २% आशयितदृष्टिः आरोपिता दृष्टिः। ३ स्पेटिवः। ४ जाय।
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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