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________________ यातिचतुष्कके अभाव में समादिचतुष्ककी अवस्था २० स्मरण और वहां स्थित जिनेन्द्रकी सोभा माठ त्रातिहायोंकी शोभा रचना सुने चन्द्र (मृगांक ) का आश्रय क्यों लिया कमका कम नहीं, किन्तु जिनचरणोंमें रहती है जिनेन्द्र के द्वेषियोंका अपराध खुदका है। जिनेन्द्रकी स्तुति और नमस्कारका प्रभाव मा विष्णु कादि नाम आपके ही हैं जिनेन्द्रकी महिमा पद्ममधि-पत्राविंशतिः जिनवाणीकी महिमा नयोंका प्रमाथ ३५ बनेकी स्तुतिमें बृहस्पति नादि भी असमर्थ हैं ३६ प्रभुके द्वारा प्रकाशित पथके पचिक निरुपद्मक मोक्षका काम करते हैं ३० मोनिधिके सामने अन्य सब निधियां तु जिनेन्द्रो धर्मकी अन्य धर्मोले विशेषता जिनके बढ़ने में पा ११ हैं ३८ ३९-४० सीमों कोकोंके जन व इत्रकेद्वारा जिनेन्द्रदर्शन देवों द्वारा प्रभुचरणों मीचे सुवर्णकमकों की चिनेकी स्तुति शक्य नहीं है स्तुति में जिलचरणोंके प्रसादकी प्रार्थना १४. जिनदर्शनस्तवन की महिमा सरसादीकी दीपकले विशेषता सरस्वती मार्गकी विशेषता लोक सरस्वतीकी प्रसता बिना तत्वनिश्वय नहीं होता ११ ११-१२ | मोक्षपद सरस्वती के भाश्रवसे ही प्राप्त होता है १२ - १३ २३- ३०| सरस्वतीकी जन्म भी महिमा १४-२८ ३१-३१ काम्मरचनायें सरस्वतीका प्रसाद ही काम करता है २१ सरस्वतीके इस क्षेत्रके पढ़नेका फस्ट ६. सरस्वतीके वन में असमर्थ होनेसे क्षमायाचना ३१ १५. श्रुतदेवास्तुति सरस्वती के चकमक अमबन्ध हो सरसीके प्रसादसे उसके सनकी प्रतिज्ञा मीर नचनी नसमर्थता लोक सरस्वती प्रभावसे मोक्षपद भी शीघ्र प्राप्त हो जाता है सरस्वतीके विना ज्ञानकी प्राप्ति सम्मद नहीं सरस्वती के बिना प्राप्त मनुष्य पर्याय में ही नष्ट हो जाती है ४२-४३ ४१ ४५ ०५ 90 ४८-५० ५१ ५२-५७ ५८-६० 11 १८. शान्तिनाथस्तोत्र तीन छत्रादिरूप माठ प्रातिहायोंके भावयसे भगवान् वनाथ तीर्थंकरकी स्तुति १-३४, पृ. २१४ जिस स्तुतिको इन्द्रादि भी नहीं कर सकते हैं उसे मैंने भक्तिवचा किया है १-३४ १- ३१, प्र. २१९ | १९. जिनपूजाष्टक 1 १-१ ५ 6 १६. स्वयंभूस्तुति १–२४, पृ. २२७ भावि महाबीरात २४ तीर्थकरोंका गुणकीर्तन १-१४ ८-५ १० १७. सुप्रभाताष्टक धातिक्रमको नष्ट करके स्थिर सुप्रभातको प्राप्त करनेवाले जिनेन्द्रोंको नमस्कार जिनके सुप्रभात स्तवनकी प्रतिक्षा भई परमेष्ठी के सुप्रभातका स्वरूप व उसकी स्तुति १–८, पू. २३३ 43 ३-८ १–९, पृ. २३७ - चन्दना माठ वन्मोंसे पूजा व उसके फ का 1-6 १-१०, पृ. २४० पुष्पांजलि देना वीतराग जिनकी पूजा केवळ आत्मकल्याणके लिये की जाती हैं " 1-6 १० २०. करुणाष्टक १-८, पृ. २४३ अपने ऊपर दया करके जन्म परम्परासे सुक करनेकी प्रार्थना 9-6
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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