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________________ २११ -780:१३-४९] ११. प्रामस्तोत्रम् 727) अलियं कमले कमला कमकमले सुह जिमिद सा बसा। पहकिरणणिण घरंति पयजणे से कडासा ॥ ४६॥ 728) बे कयकुवलपहरिसे तुमम्मि विदेसिणो स ताण पि । दोसो ससिम्मि वा माहयाण जाह वाहिमापरणे ॥ ७॥ 729) को इह हि डब्बरंतो जिण जयसंहरणमरणवणसिहिणो। तुद पयामिझरणी वारणमिणमो पजा होति । ४८ ॥ 780) करजुघलकमलमउले भालरथे तुह पुरो कप बसा। सग्गापषग्गकमला पुर्णति' तेण सप्पुरिसा ॥१९॥ भो जिनेन्द्र । कमला लक्ष्मीः कमले यसति इति अलीकम् असत्यम् । सा कमला लक्ष्मीः तव क्रमझमले वसति, अन्यथा नतबने तस्याः लक्ष्म्माः कटाक्षच्छटाः नसकिरणव्याजेन कथं पबन्ति ॥ ४॥ भो जिन । कृतकुवलय-भूवलयहर्षे स्वरि ये विवक्किः बर्तन्ते स दोषस्तेषां विद्वेषिणाम् अपि मस्ति । यथा शशिनि बन्ने धूलो आहताना पुरुषाणां तमूली वावरणं तेषाम् अपि भर III भो बिन । हि यमः । १६ माति अ माप सिमासमा उद्धरेत । यदि छेत् । इदं तव पदस्ताविनिरिणीवारि जल न भविष्यति ॥ ४०॥ भो जिन । भालथे करयगलकमलमकले स्वर्गापवर्गकमला लक्ष्मी करकमले । तब पुरतः अग्रे मुकुलीहतें । तेन कारणेन सपुत्राः तत्करकमलं तव अप्रतः कुर्वन्ति ॥४९॥ मो जिन । तन पुरतः आपके नसोंकी दिनों छलसे उसके नेत्रकटाक्षोंकी कान्ति संगतिको प्राप्त हो सकती है॥१६॥ हे जिनेन्द्र ! कुवलय अर्थात् भूमण्डलको हर्षित करनेवाले आपके विषयमें जो विद्वेष रखते है वह उनका ही दोष है । जैसे-कुवलय (कुमुद ) को प्रफुल्लित करनेवाले चन्द्र के विषयमें जो मूर्ख बाहिरी आवरण करते हैं तो वह उनका ही दोष होता है, न कि चन्द्रका | अभिप्राय यह है कि जैसे कोई चन्द्रके प्रकाश (चांदनी) को रोकनेके लिये यदि बाब आवरण करता है तो वह उसका ही दोष समझा जाता है, कि उस चन्द्रका । कारण कि वह तो स्वभावतः प्रकाशक व आल्हादजनक ही है। इसी प्रकार यदि कोई अज्ञानी जीव आपको पा करके भी आत्महित नहीं करता है तो यह उसका ही दोष है, न कि आपत्र । कारण कि आप तो स्वभावतः सब ही प्राणियोंके हितकारक है॥४७॥हे जिन | यदि आपके चरणोंकी स्तुतिरूप यह नदी रोकनेवाली (बुझानेवाली ) न होती तो फिर यहां जगत्का संहार करनेवाली मृत्युरूप दावामिसे कौन बच सकता था! अर्थात् कोई नहीं शेष रह सकता था ॥ १८॥हे भगवन् ! तुम्हारे आगे नमस्कार करते समय मस्तकके ऊपर खित दोनों हाथोंरूप कमलकी कलीमें चूंकि स्वर्ग और मोक्षकी लक्ष्मी निवास करती है, इसीलिये सज्जन पुरुष उसे (दोनों हाथोंको मालस) किया करते हैं ||१९|| हे जिनेन्द्र! तुम्हारे आगे नम्रीभूत हुए सिरसे चूंकि मोहरूप ठगके द्वारा स्थापित की गई मोइनलि ( मोहको प्राप्त करानेवाली धूलि ) नाशको प्राप्त हो जाती है, इसीलिये विद्वान् जन शिर झुकाकर आपको नमस्कार किया करते हैं ॥ ५० ॥ हे भगवन् ! जो लोग तुम्हारे नमा आदि सब नामोंको दूसरों (विधाता आदि) के सलाते हैं वे मूर्ख मानो चन्द्रकी चांदनीको जुगुनमें जोड़ते हैं ।। विशेषार्थ-जिस प्रकार जगुनका प्रकाश कमी चांदनीके समान नहीं हो सकता है उसी प्रकार ब्रह्मा, विष्णु और महेश इत्यादि जो आपके सार्थक नाम हैं वे देवस्वरूपसे माने जानेवाले दूसरोंके कभी नहीं हो सकते-दे सब तो आपके ही नाम हैं। बथा वर्णति। २ससहित ३ जान तर ति। ४ ककवेन ।
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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