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________________ २४२ पसनन्दि-पञ्चविंशतिर . 471) कृत्वा कार्यशतामि पापबहुलान्याधिस्य खेदं पर मानस्था बारिधिमेखला यमुमती दाखेन यचार्जितम् । सत्पुनादपि जीवितादपि धर्न प्रेयो ऽस्य पन्थाः शुभो पान तेन च दीयतामिदमहो नाम्येम तत्संगतिः ॥ १३ ॥ 672) यानेनैव पृहस्थता गुणवती लोकायोयोतिका सैव स्यामनु तहिना धनषतो लोकळयध्वंसकृत् । दुर्व्यापारशतेषु सत्सु गृहिणः पाप पखुत्पद्यते तन्नाशाय शशाङ्कशुनपरासे पानं च मान्यस्परम् ॥ १४ ॥ 478) पात्राणामुपयोगि यत्किल धने तशीमती मम्यते येनानम्तगुणं परत्र सुखद व्यावर्तते तत्पुनः । योगाय गतं पुनर्धनमतस्सनमेष शुष सर्षालामिति संपदा राहवता दाने मधानं फलम् ॥ १५॥ ततः पश्चात् । विमुफियते ॥ १२॥ तत् पने पुत्रादपि जीवितादपि । प्रेयः बालभम् । यत्त पनम् । दुःखेन भर्जितम् उपाकि तम् । किं वा । अकार्यशतानि पापरहुलानि कृत्वा पुनः पर खेदमू भाभिस्य प्राप्य । र पुनः 1 वारिधिमेखल्य बहमदी प्रान्स्वा धनम् उपार्जितम् । अस्य धनस्य । शुभः पन्था मार्गः । एक दानम् । तेन कारणेन । महो इति संयोधने । भो कोकाः । इदं धनम् । हीयताम् । तस्य धनस्य अन्येन सह संगतिनं ।। १३ ॥ ननु इति वितकें । धनवसः पुंसः गृहस्थता दानेन एष गुणवती लोक्लय-उयोतिका । स्थान मकेत् । सा एच गृहस्थता । सदिना तेन दानेन विना। तहस्थपदं लोकायध्वंसकृत् । हिमा गृहस्थस्य । दुर्यापासातेषु सत्सु यत्पापम् उत्पयते तमाशाय पुनः शशाशुश्रयशसे दाम पर श्रेष्ठम् । अन्यद म १४॥ किल इति सत्ये । यत् धनम् । शत्राणाम् उपयोगि पात्रनिमित भवति। धीमता तखन मन्यते । येन कारणैन । तद धनम् । पुनः परत्र परलोके । मनम्तगुर्ग सुखद व्यावर्तते । पुनः यत् धनम् । भोगाय गतम् । धनवतः गृहस्थस्य । तत् धनम् । नाम् शय नीरोगता, और शाखके निमित्तसे आश्चर्यजनक विद्वता प्राप्त होती है । सो अभयदानसे पुरुषको इन सब ही गुणोंका समुदाय प्राप्त होता है तथा अन्तमें उन्नत उन्नत पदों ( इन्द्र एवं चक्रवर्ती आदि) की प्रातिपूर्वक मुक्ति भी प्राप्त हो जाती है ॥ १२ ॥ जो धन अतिशय खेदका अनुभव करते हुए पापप्रचुर सैकडों दुष्कार्योको करके तथा समुद्ररूए करधनीसे सहित अर्थात् समुद्रपर्यन्त पृथिवीक्षा परिभ्रमण करके बहुत. दुससे कमाया गया है वह धन मनुष्यको अपने पुत्र एवं प्राणोंसे भी अधिक प्यारा होता है । इसके व्ययका उत्तम मार्ग दान है । इसलिये कष्टसे प्राप्त उस घनका दान करना चाहिये । इसके विपरीत दूसरे मार्ग (दुर्व्यसनादि ) से अपव्यय किये गये जानेपर उसका संयोग फिरसे नहीं प्राप्त हो सकता है ॥ १३ ॥ दानके द्वारा ही गुणयुक्त गृहस्थाश्रम दोनों लोकोंको प्रकाशित करता है, अर्थात् जीवको दानके निमित्तसे ही इस भव और परभव दोनोंमें सुख प्राप्त होता है । इसके विपरीत उक्त दानके विना धनवान् मनुष्यका यह गृहस्थाश्चम दोनों लोकोंको नष्ट कर देता है । सैकड़ों दुष्ट व्यापारोंमें प्रवृत्त होनेपर गृहस्थके जो पाप उत्पन्न होता है उसको नष्ट करनेका तथा चन्द्रमाके समान धवल यशकी प्राप्तिका कारण वह वान ही है, उसको छोड़कर पापनाश और यशकी प्राप्तिका और कोई दूसरा कारण नहीं हो सकता है ॥ १४ ॥ जो धन पात्रों के उपयोगमे आता है उसीको बुद्धिमान् मनुष्य श्रेष्ठ मानते हैं, क्योंकि, वह अनन्तगुणे सुखका देनेवाला होकर परलोकमें फिरसे भी प्राप्त हो जाता है। किन्तु इसके विपरीत जो धनवान्का धन भोगके निमित्तसे नष्ट होता है वह निश्चयसे नष्ट ही हो जाता है, अर्थात् दानजनित पुण्यके अभावमै वह फिर कभी १ मधीमता । २ श गृहस्सस्य गृहिणः ।
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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