SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 167
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ -88978-01] १. एकापसप्ततिः 877) निःस्पृहायाणिमायनखण्डे लाम्पसरोजुषे। ईसाय शुषये मुक्तिहसीदचारशे नमः ॥ ७० ॥ 78) मानिनोऽमृतसंगाय मृत्युस्तापकरोऽपि सन्। मामकुम्भस्य लोकेऽस्मिन् भवेत्याकविधिर्यथा ।। 379) मानुभ्यं सरकुले जन्म लक्ष्मीर्मुशिः कृतहप्ता । विवेकेन विना सर्षे सदमेतच किंचन ॥ ७२ ॥ 380) चिदचिद वे परे हवे विवेकस्तनिवेचनम् । उपादेयमुपादेयं हेयं हेयं च कुर्षतः ।। ७३ ॥ 981) खं किंचित्सुखं किंचिधिसभाति जडात्मनः । संसारे ऽत्र पुनर्नित्यं सर्व पुर्व विवेकिनः॥ 382) हेयं हि कर्म रागादि सत्कार्य च विवेकिनः । उपादेयं परंज्योतिरुपयोगैकलक्षणम् ॥ ७५॥ 388) यदेव चैतन्यमई सदेव तदेवं जानाति सदेव पश्यति । तदेव चैक परमस्ति निधयात् गतोऽसि भाग्न सकता परम् ॥ ७ ॥ दोषविनाशकारणम् ॥ ३९ ॥ इसाय नमः । किंलक्षणाय ईसाय परमात्मने । साम्यसरोजुषे साम्पसर सेवकाय । पुनः किलक्षणाय परमात्मने। अणिमायजखले खर्गधीकमला। निःस्पृहाय उदासीनाय । पुनः किलक्षणाय । शुचये पवित्राय 1 पुनः किलक्षणाय हंसाय । मुजिहंसीदत्तदृशे मुफिइसिनीदत्तनेत्राय ॥ ७० ॥ मृत्युः भातापकरः मपि सन् हानिनः पुरुषस्य । अमृतसंगाय मुखाय भवेत् । अस्मिन् लोके यथा आमकुम्भस्य अपक्ककलशस पाकविधिः पककरणम् ॥ १॥ मानुय सकले जन्म लक्ष्मीः बुद्धिः कृतज्ञता सर्व विवेकन बिना । सप्त विद्यमानम् अपि । असत् अविद्यमानम् । एतत् किंचन ने ॥७२॥ चित् अचित् परे । तत्त्वे समीः यो पेला शिवार । विशाल कुषः हुनेः उपादेयं तस्वम् उपादेयं प्रहणीयम् । न पुनः। हेय तत्त्व देयं सजनीयम् ॥ ७३ ॥ अत्र संसारे । जहात्मनः भूस्य । शित किंचित् कुवं किंचिरमुख प्रतिभाति । पुनः विवेकिनः सिस सर्व दुःख भाति । नित्यं सदैव ॥ ४ ॥ हि यतः । रागादि कर्म । हेयं त्यजनीयम् । च पुनः । विवेकिनः । तत्काय तस्म रागादिकर्मणः कार्य सजनीयम् । परंज्योतिः उपादेयं महणीयम् । मिलक्षणं ज्योतिः । उपयोगहलक्षण शानदर्शनोपयोगलक्षणम् 11 ७५ ॥ यत् । एव निश्चयेन । चैतन्यतत्वम् अस्ति। तदेव भइम् । सबैब भात्मतत्व सर्व जानाति । तदेन चैतन्यं सर्व लोक पश्यति अवलोकयति । व पुनः । निश्चयात, तदेव एक ज्योतिः । परम् उत्कृष्टम् । अस्ति । भायेन विचारणेन अपना चैतन्येन ऋद्धिरूपी कमलखण्ट (स्वर्ग)की अभिलाषासे रहित है, समतारूपी सरोवरका आराधक है, पवित्र है, तथा मुक्तिरूपी हंसीकी ओर इष्टि रखता है, उसके लिये नमस्कार हो । ७० ॥ जिस प्रकार इस लोकमें कच्चे घड़ेका परिपाक अमृतसंग अर्थात् पानीके संयोगका कारण होता है उसी प्रकार अविवेकी जनके लिये सन्तापको करनेवाली मी वह मृत्यु ज्ञानी जनके लिये अमृतसंग अर्थात् शाश्धतिक सुख (मोक्ष) का कारण होती है ॥ ७१ ॥ मनुष्य पर्याय, उत्तम कुलमें जन्म, सम्पत्ति, बुद्धि और कृतज्ञता (उपकारस्मृति ); यह सब सामग्री होकर मी विवेकके विना कुछ भी कार्यकारी नहीं है ॥ ७२ ।। चेतन और अचेतन ये दो भिन्न तत्त्व हैं। उनके भिम स्वरूपका विचार करना इसे विवेक कहा जाता है । इसलिये हे आत्मन्! तू इस विवेकसे ग्रहण करने के योग्य जो चैतन्यस्वरूप है उसे ग्रहण कर और छोड़ने योग्य जड़ताको छोड़ दे ।। ७३ ॥ यहां संसारमै मूर्ख प्राणीके चित्तमें कुछ तो सुख और कुछ दुखरूप प्रतिमासित होता है । किन्तु विवेकी जीवके चित्तमें सदा सब दुखदायक ही प्रतिभासित होता है । विशेषार्थ- इसका अभिप्राय यह है कि अविवेकी प्राणी कभी इष्ट सामग्रीके प्राप्त होनेपर सुख और उसका वियोग हो जानेपर कभी दुखका अनुभव करता है। किन्तु विवेकी प्राणी हट सामग्रीकी प्राप्ति और उसके वियोग दोनोंको ही दुखप्रद समझता है। इसीलिये वह उक्त दोनों ही अवस्थाओंमें समभाव रहता है । ७४ !! विवेकी जनको कर्म तथा उसके कार्यभूत रागादि भी छोड़नेके योग्य हैं और उपयोगरूप एक लक्षणवाली उत्कृष्ट ज्योति ग्रहण करनेके योग्य है ॥ ७५ ॥ जो चैतन्य है यही में हूं। वही चैतन्य जानता है और वही चैतन्य देखता भी है। निश्चयसे १शन' नास्ति । २ चैतन्य मलि।
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy