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________________ -319:४१२] ७. एकस्वसप्ततिः ११३ 318) बहिर्षिषयसंबन्धः सर्वः सर्वस्य सर्वदा । अतस्तनितम्यबोधयोगौ तु पुलभौ ॥१॥ 319) लब्धिपश्चकसामग्रीविशेषास्पात्रां गतः । मध्यः सम्यगरगादीनां यः स मुक्तिपथे खितः॥१२॥ पुंसः पुरुषस्य । प्रामाण्यतः वाचः प्रामाण्यम् । इष्यते कथ्यते ॥ १० ॥ बहिर्विषयसंबन्धः पायविषयसैबन्धः सर्वः । सर्वस्म लोकस्म । सर्वदा सदैव वर्तते । अतः बासंबन्धात् वा अत: करणात् । तद्भिमतन्यबोधयोगौ तस्मात् बाहासंबन्धात् भित्री यौ चैतन्यबोधयोगौ। तु पुनः । दुर्लभो ॥ ११॥ यः भन्यः लम्विपञ्चकसामप्रीविशेषात्पात्रतां गतः । पक्षकसामग्री किम् । खयउवसम्मविसोही देसणपाओग्गकरणलद्धीए । चत्तारि व साम करणे सम्माचारस दामोश हरिः । हयाः लक्षणम् । एकेन्द्रियाविपचेन्द्रियपर्यन्तं श्रावककुलजन्म भनेकवार प्राप्तः सम्यक्त्वेन विना ।। द्वितीया विशुदिलधिः । तस्याः कि लक्षणम् । दानपूजादिके परिणाम निर्मल अनेक वार भये सम्परदर्शन विना। तृतीया देशनालब्धिः । तस्याः लक्षणम् । गुरुको उपवेश सप्त तस्व नव पदार्थ पचारिखकाय षट् द्रव्य अनेकदार सुनी बकाणी सम्मग्दर्शन बिना, अभ्यन्तरकी छवि बिना ३ । चतुर्थी प्रायोग्यलन्धिः। तस्याः लक्षण सर्व कर्मनुकी स्थिति एक एक भाग आणि राखी तपकेबल कर सम्पदर्शन विना पुनरपि सर्व कर्मनुकी सर्वदेशस्थिति बाधी ४ । करणकन्धिः पञ्चमी। सस्थाः कि लक्षणम् । वह करमलब्धि सम्पष्टि जीवोंके होती है। करणलब्धेव भेदात्यः अषःकरणम् अपूर्वकरणम् अनिवृत्तिकरगं का अधःकरण किम् । सम्परत्वक परिणाम मिथ्यात्वके परिणाम समान करै । द्विसीयगुणस्थाने । भपूर्वकरणे किम् । सम्यक्त्व के परिणाम अपूर्व चवहि। भनिरक्तकरणं किम् । सम्यक्त्वके परिणामनिकी नियुक्ति माही दिन दिन चढते जाहि । इस संसारी बीपने बिना सम्यत्वके वार सन्धि तो अनेकवार पाई। परन्तु पञ्चमी करणलम्धि दुर्लभ है, क्योंकि वह संसारी जीवमि सम्पष्टिको ही होती है। यः मम्मः पञ्चसामग्रीविशेषास्पात्रता गतः । शाम् । सम्पगगाडीनाम् । स मम्मः मुक्लिपये स्थितः ॥ १२॥ सम्पन्दम्बोधचारित्रत्रिदय अल्पज्ञ और राग-द्वेषसे सहित है उसका कहा हुआ धर्म प्रमाण नहीं हो सकता, किन्तु जो पुरुष सर्वश होनेके साथ ही राग-द्वेषसे रहित भी हो चुका है उसीका कहा हुआ धर्म प्रमाण माना जा सकता है ।।१०।। सब याम विषयोंका सम्बन्ध समी प्राणियोंके और वह भी सदा काल ही रहता है ! किन्तु उससे मिल चैतन्य और सम्यग्ज्ञानका सम्बन्ध ये दोनों दुर्लभ हैं ॥ ११ ॥ जो भव्य जीव क्षयोपशम, विशुद्धि, देशना, प्रायोग्य और फरण इन पांच लब्धियों रूप विशेष सामग्रीसे सम्यग्दर्शन, सम्पन्शान और सम्यक्चारित्ररूप रखत्रयको धारण करनेके योग्य बन चुका है वह मोक्षमार्गमें स्थित हो गया है ॥ विशेषार्थ-प्रथमोपशम सम्यक्त्वकी प्राप्ति जिन पांच लब्धियोंके द्वारा होती है उनका स्वरूप इस प्रकार है-१. क्षयोपशमलन्धिजर पूर्वसंचित कोंके अनुभागस्पर्धक विशुद्धिके द्वारा प्रत्येक समयमें उत्तरोत्तर अनन्तगुणे हीन होते हुए उदीरणाको प्राप्त होते हैं तर क्षयोपशमलब्धि होती है। २. विशुद्धिलब्धि-प्रतिसमय अनन्तगुणी हीनताके क्रमसे उदीरणाको प्राप्त कराये गये अनुभागस्पर्धकोंसे उत्पन्न हुआ जो जीवका परिणाम सातावेदनीय आदि पुण्य प्रकृतियोंके बन्धका कारण तथा असातावेदनीय आदि पाए प्रकृतियोंके अवधका कारण होता है उसे विशुद्धि कहते हैं । इस विशुद्धिकी प्राप्तिका नाम विशुद्धिलब्धि है । ३. देशनालन्धि- जीवादि छह द्रव्यों तथा नौ पदार्थोके उपदेशको देशना कहा जाता है । उस देशनामें लीन हुए आचार्य मादिकी प्राप्तिको तथा उनके द्वारा उपदिष्ट पदार्थके महण, धारण एवं विचार करनेकी शक्तिकी प्राप्तिको भी देशनालब्धि कहते हैं। ४. प्रायोग्यलन्धि- सन कोकी उत्कृष्ट स्पितिको घासकर उसे अन्तःकोदाकोकि मात्र स्थितिमें स्थापित करने तथा उक्त सब कोंके उत्कृष्ट अनुभागको पातकर उसे दिखानीय (पातियाकर्मोके लता और दारुरूप तथा अन्य पाप प्रकृतियोंके नीम और कांजीर रूप) अनुभागमें स्वापित करने को प्रायोग्यलब्धि कहा जाता है। ५. अधःप्रवृत्तकरण, अपूर्वकरण और अनिवृतिकरण इन तीन प्रकारके परिणामोंकी या पुनः तरिकासन्यमोपयोगी दुर्बभौ । पयन.१५
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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