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________________ एनपिचविंशतिः [269380269) दुखण्यालसमाकुल भवन जान्याम्पकाराधित यस्मिन् दुर्गतिपल्लिपातिकुपधैर्धाम्यन्ति सर्वे ऽशिनः । तम्मध्ये गुरुवाक्प्रदीपममलं ज्ञानप्रमामासुर प्राप्यालोक्य च सत्पथ सुखपद याति प्रबुदो धुवम् ॥ १७ ॥ 270) येव स्वकर्मकृतकालकलाय जन्तुस्तत्रैव पाति मरणं न पुरो म पधात् ।। मूढास्तथापि हम स्वजन विधाय शोक परं प्रचुरदुःखभुजो भवन्ति ॥ १८ ॥ 271) वृक्षावृक्षमिवाण्डमा मधुलिहः पुष्पाच पुष्पं यथा जीवा यान्ति भवानवाम्सरमिहाधान्त तथा संसृती। तजाते ऽथ मृते ऽथ षा न हि मुवं शोकं न कसिपि प्रायः प्रारमते ऽभिगम्य मतिमानस्थैर्यमित्यहिनाम् ॥ १९ ॥ भानमन्ति । सस निवितम् । विदुषा पणिवेन ! कस्य कृते कारणाम शोध्यते । अपि तु न शय्यते ॥१६॥ भववन संसारपनम् । दुसव्याला इस्विमः तैः समाकुल भरितम् । पुनः कलक्षण भववनम् । जाम्पान्धकार-मूर्खतान्धकार-भाषितम् । तस्मिन्भववरे संसारवने। दुर्गतिपहिलपातिकुपीः दुर्गतिभिलवसतिकागमनशीलकुमार्गः। म मङ्गिमः जीवाः । भ्राम्यन्ति । तन्मध्ये संसारवनमध्ये । गुरुवार गुप्लनने प्रदीप प्राप्य | च पुनः । सत्पषम् । भालोम्म दृष्टा । प्रजुसः शानवान्। सुखपद मोक्षपदम् । माति गच्छति । विलक्षणं गुरुवरनम् । अमल निर्मलम् । शानप्रभाभासुरे प्रकाशमानम् ॥ १७॥ अत्र संसारे । मा स्वकर्मातकालकला स्खकोपार्जितकालाला मरणवेला । अस्ति । तत्रैव वेलायाम् । अन्नुः जीवः। मरण याति गच्छति । न पुरोन भने । न पश्चात् । हि यतः । मूडाः जनाः । तथापि खजने बछे । मृवे सति । पर केवलम् । शोक विधाय स्वा । प्रचुरतुःसभोकारः भवन्ति ॥ १८ ॥ इह संसारे । गीवाः यथाबधान्त निरन्तरम् । भवात् भवान्तर यान्ति । पर्यायात् पोयान्तर गच्छन्ति । तत्रान्तमाह। यथा अण्णाजाः पक्षिणः । वृक्षारक्ष यान्ति । यथा मालिहः महाः । पुष्पात् अन्यत्पुष्प विद्वान् मनुष्य इसके लिये कुछ भी शोक नहीं करता ॥१६॥ जो संसाररूपी वन दुःखोंरूप सोसे व्याप्त एवं अज्ञानरूपी अन्धकारसे परिपूर्ण है उसमें सब प्राणी दुर्गतिरूप भीलोंकी वस्तीकी ओर जानेवाले खोटे मासे परिश्रमण करते हैं। उस (संसार-वन) के बीच विवेकी पुरुष ज्ञानरूपी ज्योतिसे देदीप्यमान निर्मल गुरुके वचन (उपदेश) रूप दीपकको पाकर और उससे समीचीन मार्गको देखकर निश्चयसे सुखके स्थानभूत मोक्षको प्राप्त कर लेता है । विशेषार्थ-जिस प्रकार कोई पथिक साँसे भरे हुए अन्धकारयुक्त बनमें भूलकर खोटे मार्गसे भीलोंकी वस्तीमें जा पहुंचता है और कष्ट सहता है । यदि उसे उक्त वनमें किसी प्रकारसे दीपक प्राप्त हो जाता है तो वह उसके सहारेसे योग्य मार्गको खोजकर उसके द्वारा अभीष्ट स्थानमें पहुंच जाता है । ठीक उसी प्रकारसे यह संसारी प्राणी भी दुःखोंसे परिपूर्ण इस अज्ञानमय संसारमें मिथ्यादर्शनादिके वशीभूत होकर नरकादि दुर्गतियों में पहुंचता है और वहां अनेक प्रकारके कष्टोंको सहता है । उसे जर निर्मल सहरुका उपदेश प्राप्त होता है तब वह उससे प्रबुद्ध होकर मोक्षमार्गका आश्रय लेता है और उसके शरा मुक्तिपुरीमें जा पहुंचता है ।।१७|| इस संसारमें अपने कर्म के द्वारा जो मरणका समय नियमित किया गया है उसी समयमें ही प्राणी मरणको प्राप्त होता है, वह उससे न तो पहिले मरता है और न पीछे भी । फिर मी मूर्सजन अपने किसी सम्बन्धीके मरणको प्राप्त होनेपर अतिशय शोक करके बहुत दुःखके भोगनेवाले होते हैं ॥ १८ ॥ जिस प्रकार पक्षी एक वृक्षसे दूसरे वृक्षके ऊपर तथा प्रमर एक पुष्पसे दूसरे पुष्पके ऊपर जाते हैं उसी प्रकारसे यहां संसारमें जीव निरन्तर एक पर्यायसे दूसरी पर्यायमें १० भवबने दुर्गवि । एक गुरुवयनं । तया ।
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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