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________________ -1941-] परेशान 191) सणेवारसवा भवत्पसिळता सत्पुष्पदामापते संपत रसायन विचमपि प्रीति विष रिपुर । पेचा पान्ति व प्रसन्मनसा किमामहे धर्मा पस्य नमोऽपि तस्य सततं रतौर परेवति । १९५॥ 192) उपग्रीपरविप्रतापदहमज्वालामितसविर पापितमतिर्मरी सूबुतर पान्यः पया पीडितः। तदनाम्लग्घडिमाद्रिकवरचितमोरामायबोलसव. पारावस्मसमो हि संससिपये धर्मो भवेदेहिनः ॥ १९२ ॥ 198) संक्षारोपसमीरसहतिहतमोद्भूतमीरोजसत् तुलोमिभ्रमितोतनकमकरप्राहादिमिर्मीषणे । अम्मोषौ विधुतोमवारवशिक्षिज्यालाकराले पत. अन्तोऽपि विमाममाशु फुरते धर्मः समालम्बनम् ॥ १९ ॥ 194) उझान्ते हे शिरोभिः सुरपतिभिरपि स्तूयमानाः सुरोधे गीयन्ते किरीमिर्ललितपवलसनीतिमिर्मकिरागात् । रसायनम् अमूर्त संपद्यते गायते । सधार्मिणो नरस्य । रिपुः प्रीति बिभत्ते । धर्मयुगपुरुषस्व प्रसन्नमणसः देवाः यस गान्ति । वा भया । पाकिमहे पार पार कि कथ्यते । नमः आकाशः सतत परैः रसै वर्षति ॥ ७॥ यः कपिम्पः पान्यः । मूत्तर कोमलः । उनीप्मरविप्रतापवहनज्वालभितः ग्यशाबाबसूर्येण पीडितः । पित्तप्रातः 1 मरी मस्पले । चरुन् गच्छन् । पषा मार्गेण। पीडितः । तस्म पत्रिकस्य । देहिनः जीरस । संसतिपये संसारमामें। धर्मः बार मीत्रम् । लम्बाहिमादि-हिमाचल के रचितप्रोहामयचोबसमारनेरमसमो भवेत् ॥ १५२ ॥ भो मण्याः भूपता पुष्यमाहात्म्यम् । धर्मः अम्भोधी समुद्रे । पतजन्तोः जीवस्य आशु भीग्रेण।बामाको अपि । समालम्बम विमानम्। कुरुते । किनभने समुदे। संहार: प्रमयकामा तस प्रलयस्य उपसमीरसंहतिः पानसमूहः तेन समान हतप्रोजूतपीडित-महतं नी जलं तस जलस्य ये टासाः कर्मयः तः कर्मिभिः प्रामिताः उसनकपकरमाहादयः तैः अचरजीवः मीषणे मयानके । पुमः किलक्षणे समझे। विधुत-कम्पित[वम उचालितवावशिवाजाला तया कराने हदे ॥ १९३ ॥ ये मनुजा नराः । सहा एक धर्मम् । विषाति कुर्वन्ति । से समर्मिणः । झुरमतिमिः शिरोभिः मस्तक । उपन्ते पार्यन्ते । ते सधर्मिणः । पुरोः वेक्समूहः स्तूपमानाः अपि तलवार सुन्दर फूलोंकी माला हो जाती है, विष मी उत्तम औषधि बन जाता है, शत्रु प्रेम करने लगता है, तथा देव प्रसाचित होकर आज्ञाकारी हो जाते हैं। बहुत क्या कहा जाय ! जिसके पास धर्म है उसके ऊपर आकाश मी निरन्तर रलोंकी वर्षा करता है ॥ १९१ || मरुभूमि (रेतीली पृथिवी-मारवार) में चलनेवाला जो पित्तप्रकृतिवाला सुकुमार पथिक प्रीष्ण अनुके तीक्ष्य सूर्यके प्रकृष्ट ताफ्लप अमिकी ज्वालासे संतप्त होकर चिरकालसे मार्गके भमसे पीडाको प्राप्त हुआ है उसको जैसे शीघ्र ही हिमालयकी लताओंसे निर्मित एवं उत्कृष्ट यंत्रों (फुब्बारों ) से शोभायमान पारागृहके प्राप्त होनेपर अपूर्व मुखका अनुभव होता है वैसे ही संसारमार्गमें चलते हुए प्राणीके लिये धर्मसे अमूतपूर्व मुलका अनुभव होता है॥ १९२॥ जो समुद्र घातक तीवण वायु ( प्रलयपवन ) के समूहसे ताड़ित हुए जलमे उठनेवाली उन्नत लहरोंसे इभर उधर उछलते हुए नक, मगर एवं प्राह आदि हिंसक जलजन्तुओंसे भयको उत्पन्न करनेवाला है तथा कम्पित तीक्ष्ण वाडवामिकी ज्वालासे भयानक है ऐसे उस समुद्रमें गिरनेवाले जन्तु के लिये धर्म शीघ्रतापूर्वक भाकाशमें भी आलबनभूत विमानको कर देता है ।। १९३ ॥ जो मनुष्य सदा अद्वितीय धर्मका आभय करते हैं उन्हें इन्द्र मी शिरसे धारण करते हैं, देवोंके समूह उनकी स्तुति करते हैं, किनरियां ललित पदोंसे श्रोमायमान
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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