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________________ ११० पद्मचरित और उसमें प्रतिपादित संस्कृति की शुद्धि हो म प्रशस्त है स्त्री पति और पुत्र दोनों का आलिङ्गन करती है। परन्तु भाव जुदे जुदे होते हैं | १००२ मनुष्य मिलते समय सबसे पहले कुशल-क्षेम पूछा करते थे । अञ्जना तथा वसन्तमाला को गुफा में जब मुनिराज दिखाई पड़े तब दोनों सखियों ने कहाहे भगवन् ! हे कुशल अभिप्राय के धारक ! हे उत्तम चेष्टाओं से सम्पन्न ! आपके शरीर में कुशलता तो है ? क्योंकि समस्त साधनों का मूल कारण यह शरीर ही है । है गुणों के सागर ! आपका तप उत्तरोत्तर बढ़ तो रहा है ? हे विजय के धारक ! आपका बिहार उपसर्गरहित तथा महाक्षमा से युक्त तो है ? हे प्रभो ! हम आपसे जो इस तरह कुशल पूछ रही हैं सो ऐसी पद्धति है यही ध्यान रखकर पूछ रही है अन्यथा आप जैसे लोग किस कुशल के योग्य नहीं हैं ? आप जैसे पुरुषों की शरण में पहुँचे हुए लोग कुशलता से युक्त हो जाते हैं, अतः स्वयं अपने आपके विषय में अच्छे और बुरे पदार्थों की चर्चा ही क्या करना ? १०.०३ विद्या सिद्ध करने के बाद दशानन आदि से उनके गुरुजनों ने कहा कि हे पुत्रो ! इतने दिनों तक तुम मुख से रहे ?१००० इस प्रकार कुशलक्षेत्र के अनेक उदाहरण मिलते हैं । १००१ बड़े लोग छोटों के प्रति दस 1००५ अहो पुत्र 19004 पुत्र कहकर सम्बोधित करते थे । बढ़ा भाई छोटे भाई के लिए हे तात! हे बालक ! हे अनुज ! नाम लेकर सम्बोधित करता था । १००८ बड़ों के लिए हे देव ! (देव), हे नाथ ! (नाथ), हैं महाबुद्धिमान् १६०१५ प्रभो ! (प्रभो ), १७१२ हे स्वामिन्! ( स्वामिन् ), १०१३ श्वर), १०५४ हे विचक्षण ! (विचक्षण), ' १०१५ हे नाथ ! हे आर्य ! (आर्य ), १०५८ हे पूज्य 1 ( पूज्य), राजन् ! इस प्रकार सम्बोधित कर बातचीत की जाती थी । हे (देव), ५०५७ १००२. पद्म० ३१।२३३ १ १००४. वही, ७ ३७२ | १००६. वही, ७।३८० | १००८, वही, ३६/५४ ॥ १०१०. वही, ५४११८ । १०१२ . वहीं, ५५९ । १०१४. वही, ५५|१० । १०१६. वही, ३२/४२ | १०१८. वही, ५० ४७ १०१० हे परमेश्वर ! ( महाबुद्धे ), १००७ (परमे - हृ देव ! राजा के लिए हैं (नाथ), १०१ १०१९ १०१५. वही ५५।१२ । १०१७. वही, ३२/४७ । १०१९. जही, ५०६४७ । १००३. पद्म० १७।१२६-१२९ । १००५. वही, ७ ३७८ । १००७. वही, ३२।१२८ । १००९. वहीं, ५४/२२ । १०११. वही, ५४।२५ । १०१३. वही, ५५/१०/
SR No.090316
Book TitlePadmcharita me Pratipadit Bharatiya Sanskriti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRameshchandra Jain
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages339
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Culture
File Size6 MB
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