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________________ न्यायविनिश्चयविवरण विपयों में होती है और शासकार एक ही वस्तुको परम्पाविरोधी रूपसे भी कथन कर जाते हैं। अतः पर स्वर में इस हरदाभारत की सम्भावना है। 'अकलदेवने इसका धिरुनुवाभासमें अन्तर्भाध किया । जा हेन विरुद्धका अव्यभिचारी अर्थात् विपक्ष में रहता है बह विस्त हत्वाभास ही होगा। . अटकृत हनुबिन्दुकी टीका (पृ. २०५) में एक पक्षण हेतुवादीका मत आता है। उसने पक्षामन्च, सपक्षसत्व, विपक्षयावृत्ति, श्रवाधितविषयत्व, असत्प्रतिपक्षय और ज्ञातस्य ये ६ लक्षण हेतुके बताये हैं। इनमें शातत्व नामके रूपका निर्देश होनेसे इस बाबीके मतसे "अज्ञात" नामका हेवाभास भी फालत होता है । अकलालेचसे इस अशात हेवाभासका अकिश्चित्करमें मन्तभाव किया है। और प्रकरणसमका जो कि दिग्नागके विरवायभिचारी जैसा है विरुद्ध हेत्वाभासमें अन्तर्भाव किया है। इस तरह अकलकदेवने सामान्य रूपसे एक हेस्वाभास कहकर भी, विशेष रूपसे असिड, विरुद्ध अनकास्तिक और अकिद्धिरकर इन चार हेत्वाभासोका कथन किया है। अकलाचेवका अभिप्राय भकिञ्चित्कर हेस्वाभासको स्वतन्त्र हेत्वाभास माननेके विषयमें सुरक्ष नहीं मालूम होता। वे लिखते है कि सामान्यसे एक असिद-हस्वाभास है।वही विरुद्ध असिद्ध और सन्दिग्धके भेदसे अनेक प्रकारका हो जाता है। ये विरुद्धादि भकिश्चित्करके विस्तार है। फिर लिखा है कि अन्यथानुपपत्ति रहित जितने ग्रिलक्षण हैं उन्हें अकिश्मिरकर कहना चाहिए। इससे ज्ञात होता है कि वे सामान्यसे हेत्वाभासीकी असिद्ध या अकिलिस्कर संझा रखना चाहते हैं। इसको स्वतन्त्र हेस्वाभास माननेका उनका आग्रह नहीं दिखता। यही कारण है कि उत्तरकालीन श्राचार्य माणिक्यनधीने अकिमि करका लक्षण और भेद कर चुकने के बाद लिया है कि इस हेत्वाभासका विचार हेत्वाभासके लक्षणों के समय ही करना चाहिए शास्त्रार्थ के समय नहीं। उस समय तो इसका कार्य पक्षदोषसे ही किया जा सकता है। अनुमानकी आवश्यकता-दर्शनके क्षेत्रमें चाांक और तस्वोपप्लघघाटीको छोड़कर सभीने अनुमानको प्रमाण माना है । चार्वाक भी ग्यघहारमें अनुमानकी उपयोगिता मानता है उसका अनुमानके निषेधसे इतना ही भर्थ है कि परलोकादि अतीन्द्रिय पदार्थों में उसकी प्रवृत्ति नहीं हो सकती। उसने अनुमामका निषेध करते समय विशेष रूपसे यही लिखा है कि कितनी भी सर्तकतासे अनुमान क्यों म किया जाय किम्मु यह देशाम्सर, कालान्तर और परिस्थितियोंकी भिमताके कारण म्पमिचारी देखा जाता है। भग्निसे उत्पन्न होनेवाला भी धुआँ, वामी में अग्निके अभाव में भी दिखाई देता है। कसले भाँपले देशान्तरम या द्रध्यान्तरके संयोगसं मीठे देखे जाते हैं। किसी देश में शिशपाकी लता भी होती है। अनन्त व्यक्तियांकी देश-कालके अनुसार अनन्त परिस्थितियाँ होती है। अनात पदार्थ भी इसी तरह परिस्थितियोंके भेदसे अनन्तानन्त प्रकारके हैं। इनमें किसी एक अव्यभिचारी नियमका बनाना अत्यन्त फटिन है। पदार्थकी सामान्य रूपसे सिद्धि करने में सिद्धसाधन है और विशेष अनुगम नहीं देखा जाता और तद्द्-विशेषोंके सम्बन्ध ग्रहण करनेमें पुरुपी आयु ही समाप्त हो जायगी । इसनी सब कठिनाइयोंके रहनेपर भी अनुमानकी प्रमाणतासे इनकार नहीं किया जा सकता। प्रत्यक्षकी प्रमाणताका समर्थन अनुमानके बिना नहीं हो सकता । इसमें अविसंवादी या भगौणत्व देतसे एक प्रत्यक्ष व्यक्तिम प्रमाणता देखकर तारश समस्त प्रत्यक्ष व्यक्तियोंको प्रमाण मानने पति स्वीकार करनी ही होगी। जहाँ भनुमान करनेवालेकी मसावधानीसे ग़लत जगह सम्बन्ध मान लिया जाता है या गालस हेतुका प्रयोग हो जाता है वहाँ उसके अपराधसे अनुमान मात्रको अप्रामाणिक नहीं कहा जा सकता । बहुससे प्रत्यक्ष मी सदोष हेतुओंसे उत्पस होमेके कारण सन्दिग्ध और विपर्यस्त होते हैं, पर इतने मात्रसे निद्रा प्रत्यक्षीको उसी अप्रमाण कोटिमें शामिल नहीं किया जा सकता। अतः ज्ञानकी स्थिति जब प्रमाणता और अप्रमापाताके झूले में झलती रहती है तब किसी ज्ञानमें प्रमाणता और किसी प्रमाणताफे निधय करनेके १ प्रमाणसं० श्लो.४७.४२ प्रमाणसं० श्लोक ४९। ३श्यामवि० २।१९७-९८ । ४ परीक्षामुख ६।३१।
SR No.090313
Book TitleNyayavinishchay Vivaranam Part 2
Original Sutra AuthorVadirajsuri
AuthorMahendramuni
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages521
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size13 MB
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