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________________ निमित्तशास्त्रम् ५५ सूरम्मितावयंती पुहवी तावेइ णिवणियाणुक्का । सोमे पुण सोममुही खेमसुभिक्खंकरी उक्का ॥ १२९ ॥ अर्थ : यदि रविवार के दिन उल्कापतन हो तो पृथ्वी पर गर्मी से सम्बन्धित पीड़ा होगी और यदि सोमवार को उल्कापतन हो तो सुभिक्ष का निर्माण करती है । जस्सय रिक्खे पड़िया तरसेव य सोहणं बहु कुणई। अण्णरसवि कुणई भयं थोवं-थोवंण संदेहो ॥१३०॥ अर्थ : उल्कापात जो जहाँ से उठा हो वहीं पर लौट जाये तो अच्छा है, अन्यथा वह पुनः पुनः भयोत्पादन करती है। इसमें किसीप्रकार का सन्देह नहीं है। - कित्तिय रोहिणिमज्झे पङमाणी कुणइ पुहइतावं । डहइय पुरगामाई रायगिहंणत्थि संदेहो ॥१३१॥ अर्थ : यदि उल्कापतन कृतिका व रोहिणी नक्षत्र में हो तो पृथ्वी के. लिये सन्तापदायक है, शहर या गाँव को राज्य या राजमहल को नष्ट कर देती है। इसमें कोई सन्देह नहीं है । चोरा लुंपंति मही रायकुलापयाची लुप्पया होंति । विलयंति पुत्तदारा पापविणस्सते तथा सव्वं ॥ १३२॥ अर्थ : धरातल पर चोरों का भय बढ़ेगा। माता पुत्र को और स्त्री प्रति को छोड़ देगी । इंदो वरसइ मंदं सस्साण विणासणो हवइ लोए ।
SR No.090300
Book TitleDavvnimittam
Original Sutra AuthorRushiputra Maharaj
AuthorSuvidhisagar Maharaj
PublisherBharatkumar Indarchand Papdiwal
Publication Year2003
Total Pages133
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size3 MB
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