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________________ २२० नमोकार च करूगा, प्रतएव में किसी तरह से पीछे नहीं लौट सकता। तुम जानो और बारह वर्ष पर्यन्त प्रजा का पालन करो तब तक मैं इधर नहीं माऊगा। रामचन्द्र के ऐसे दृढ़ प्रतिज्ञासूचक वचन सुनकर भरत बहुत दुःखी हुए। उन्होंने फिर भी रामचन्द्र से उल्टा प्रयोध्या चलने का बहुत माग्रह किया। भरत का प्रति प्रामह देख श्री रामचन्द्र ने उत्तर में कहा कि-"भरत तुम अयोध्या में जाकर राज्य करो। पिताजी ने तुमको बारह वर्ष राज्य शासन करने की प्राशा दी है । तुम उनकी प्राज्ञा का पालन करो। इसका मुझे बड़ा प्रानन्द है। इसके अतिरिक्त मैं अपनी तरफ से और भी दो वर्ष के लिए तुम्हें राज्य प्रदान करता हूं। बौदह वर्ष से पूर्व मैं इधर न पाने की प्रतिज्ञा करता हूं। मैं कदापि नहीं लौटूगा प्रतएव तुम मुझसे अधिक प्राग्रह करना छोड़ दो। प्रषिक कहने से क्या लाभ ?" श्री रामचन्द्र के इस उत्तर से भरत यद्यपि बहुत खिन्न हुए परन्तु अन्त में अब उन्हें उनके वापिस लौटाने का कोई उपाय न सूझा तब उन्हें उसी दुख दशा में रामचन्द्र के चरणों में नमस्कार कर वापिस लौट जाना पड़ा भरत राज्य तो करने लगे पर रामचन्द्र के बिना सदा व्याकुलचित्त रहा करते थे। भरत के चले जाने के प्रनन्तर श्री रामचन्द्र भी वहां से चलकर चित्रकूट पर्वत पर पहुंचे। यहाँ पर कुछ दिन विश्राम करके उन्होंने मालवा देश की प्रोर प्रयाण किया और मार्ग में धर्मात्मा वनजंघ आदि गर्ने सत्पुरुषों के मामा निवारण कर रक्षा करते हुए अनेक राजा महाराजामों की सुन्दर-सुन्दर कन्याओं का लक्ष्मण से पाणिग्रहण कराते तथा वंशस्थल गिरि पर श्री देशभूषण-कुलभूषण मुनि पर हो रहे उपसर्ग का निराकरण कर धीरे-धीरे कुछ दूरी पर विश्राम करते बहुत दिन पीछे कम से दंडकवन में आ पहुंचे। यह बन भयानक प्रौर विषम था। पर ये दोनों धीर वीर भाई जनकनन्दिनी सहित यहां ही ठहरे। कुछ दिन चढ़ चुका था अतएव भोजन सम्बन्धी सामग्री लक्ष्मण ने एकत्रित की । सीता ने कुछ देर पीछे भोजन तैयार कर अपने स्वामी से कहा-प्राणनाथ रसोई तयार है। अब आप पूजन कीजिए। दिन बहुत चढ़ा जाता है। सीता के कहे अनुसार श्री रामचन्द्र जिनेन्द्र भगवान का पूजन कर अतिथि संविभाग के लिए सुयोग्य पात्र की प्रतीक्षा करने लगे। इतने में उनके प्रबल पुण्य से एक मास के उपवास किए हुए मुनिराज वहाँ उपस्थित हुए । रामचन्द्र ने उन मुनि महाराज के दर्शनों द्वारा अपने नेत्रों को पवित्र कर तीन प्रदक्षिणा देकर उनसे निवेदन किया-महाराज । पत्र तिष्ठ तिष्ठ तिष्ठ अन्न जल शुद्ध है। इस प्रकार प्रार्थना कर उनके चरण कमलों को धोया और उस पवित्र जल को अपने मस्तक पर लगाया। पश्चात रामचन्द्र और सीता ने मुनिराज को नवधा भक्ति पूर्वक प्राहार करवाया । उसी जगह एक वृक्ष की शाखा पर जटायु नाम का पक्षी बैठा हुमा था। उसने रामचन्द्रद्वारा की हुई क्रिया को देखकर विचारा कि हाय, धिक्कार है मेरे इस जीवन को जो मुझे पशु पयाय मिली। धन्य है इस जीवन को ओ इन्हें वैसे महात्मा की सेवा तथा भक्ति करने का अवसर मिला। ये बड़े पुन्यात्मा पौर भाग्यशाली हैं। यदि मैं भी पाज मानव पर्याय में होता तो क्या माण इस सुमवसर को खाली जाने देता, हे ! भगवान यदि कभी मुझे भी पुण्य के प्रभाव से मानव पर्याय प्राप्त हो तो में भी नियम से ऐसे महात्मानों की भक्ति सेवा करूगा। . इस प्रकार के पवित्र विचार उसके हृदय रूपी सरोवर में लहर लेने लगे । मुनिराज भोजन करने के अनन्तर वहाँ पर बैठे। तब रामचन्द्र ने नमस्कार कर पूछा-स्वामी यह स्थान इस प्रकार सूना कैसे
SR No.090292
Book TitleNamokar Granth
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDeshbhushan Aacharya
PublisherGajendra Publication Delhi
Publication Year
Total Pages427
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size14 MB
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