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________________ alls मूलाराधना माया संज्वलनमें और मायाको लोभ संज्वलनमें क्षेपण करके नष्ट करते हैं. इसके अनंतर यादरष्टि विभागसे लोभको भी कृश करते हैं. आश्वासः १८१२ अध लोभसुहमकिहि वेदतो सुहमसंपरायत् ॥ पावदि पावदि । तधा तण्णामं संजमं मुई ।। २०९८ ॥ सूक्ष्मलोभगुणस्थाने सूक्ष्मलोभं निशुंभति ॥ प्राप्नोति संयमं शुद्धं तदा सदभिधानकम् ।। २१७१ ॥ विजयोन्या-अध लोभसुहमकिट्टि अथ पश्चाद्वावरकृष्टरुत्सरकालं लोभसूचमकृधि वेश्यमानः सुहमसंपराब पाषदि सूक्मसापरायता प्राप्नोति ॥ पायदि य तथा प्राप्नोति तथा तमामकं संयम शुद्ध सूक्ष्मसापरायता अधिगच्छति ॥ तदनन्तरमाप्यसूक्ष्मसापरायसंयमप्राप्त्युपपत्ति कथयति मूलाराधना | अध संचलनलोभवादरष्टिपरेयोत्तर काळं । किष्टि कटिं। तैलाधवस्थितकिट्टिकाकल्पं । सुकुमसंपराय सूक्ष्मसापरायक्षपकमा । दशमगुणस्थानम् । खण्णामं । सूक्ष्मसापरायसंझं । मुद्धं प्रथमशुक्लध्यानप्रकर्षप्रतिबद्ध सूक्ष्मलोभकठिशक्तिकत्वाचयाख्यासारख्यशुद्धसयमोसमनिमित्तत्वाद्वा निष्कलंकम् ।। अर्थ-वदनंतर अर्थात् लोभकी यादरकृष्टि के अनंतर लोभकी सूक्ष्म कृष्टिका अनुभव करनेवाले मुनिराज सूक्ष्म सापाराय नामक दसवे गुणस्थानका आश्रय करते हैं. तन उनको सूक्ष्म सांपराय नामक चारित्रकी प्राप्ति होती है, प्रथमशुक्लभ्यानके सामर्थ्यसे बादर संज्वलन लोभ कपाय सूक्ष्म होता है. इससे उनको सूक्ष्मसांपराय चारित्र प्राप्त होता है. तो सो खीणकसाओ जायदि खीणासु लोभकिट्टीसु ॥ एयत्त वितकावीचारं तो उझादि सो झाणं।। २.९१ ॥ क्षीणासु लोमकृष्टिषु नष्टकषायो यदा यतिभवति । एकस्वमवीचारं सवितर्क ध्यानमभुत स तदा ।। २१७२ ।। SAMPIAS १८१२
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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