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________________ लाराधना আঘাম: शुक्लेश्योत्तमांशं यः प्रतिपद्य विपद्यते ॥ उत्कष्टाराधना नस्य जायते पुपयकर्मणः ॥ १९९५ ।। विजयोदया-सुमाप लेस्साप शुक्ललेश्यया उत्कृष्टांश परिणतो यो मृतिमुपैति स नियमादुकृपाराधको मयति । लेझ्याविशेषवशेनाराध माविका प्रबंधन प्रवीति -- मूलारा- उक्करसं अंसयं उत्तमभाग । उकस्साराधओ। तस्योत्कृष्टाराधनेत्यर्थः । उक्तं च शुभ-उलेश्योत्तमांशं यः प्रतिपश्च विपद्यते ।। टत्कृष्टाराधना तस्य जायते पुण्यकर्मणः || लेश्याके आश्रयसे आराधनाके विकल्प कहते हैं अर्थ-शुक्ललेश्याके उत्कृष्ट अंशसे परिणत होकर जो क्षपक मरणको प्राप्त होता है उस महात्माको नियमसे उत्कृष्ट आराधक समझना चाहिये. TOPATI - खाइयदसणचरणं खओवसमियं च णाणमिदि मागो । तं होइ खीणमोहो आराहिता य जो हु अरइंतो ॥ १९१९ ॥ जे सेसा सुकाए दु अंसया जे य पम्मलेरसाए ।। तल्लेस्सापरिणामो द मज्झिमाराधणा मरणे ॥ १९२.॥ शेषांशान शुक्ललेश्यायाः पद्मायाश्च तथा श्रितः ।। नियत मध्यमा तस्य साधोराराधना मता ॥२०००। विजयोदया-जे सेसा सुषकाप.दुसया उत्कृशंशादम्ये येशुक्लतल्याया अंशा ये चापि पद्मश्याया अंशाः तत्र परिणामो मरणे मध्यमाराधना मूलारा- सेसा मध्यमाधमौ । जे यथेच प्रयोज्यशकाः ॥ अर्थ-धायिक सम्यक्त्व, और चारित्र और क्षायोपशमिक सम्यग्ज्ञान इन की आराधना करके आत्मा क्षीणमोही बनता है और तदनंतर अरईत होता है. (क्षेपक) २००७
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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