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________________ लाराधना आभासा विजयोदया-किं पुण जदिणाण करिजा हदि बिदि किं पुनर्न कार्या भवति धृतिः यतिना। कीदृशा? संसारसम्पदुक्खक्खयं करतेण संसारसर्वदुःखक्षयं कुर्वता । बहुतिब्वदुषस्वरसजाणगेण बाहनां चतुर्गतिमतानां दुःलानां रसं जानता। मूलारा--रसजाणासनेदिनः । ३ दिना! अर्थ-संपूर्ण दुःखोंका रस जाननेवाले यति क्यों न धर्य धारण करे. अर्थात जब कोई अज्ञानी भी जीव धैर्य धारण कर दुःख सहते हैं तो चैराग्यशील यतिओंका दुःख सहन करना कर्तव्य ही ठहरा दुःखसे भययुक्त होना उनके लिए नितरां अयोग्य है. असिवे दुभिक्खे वा कतारे बा भएव आगाढे ॥ रोगों व अभिभूदा कुलजा माणं ण विजहंति ।। १५१२ ॥ दुर्भिक्षे मरके कक्षभये रोगे दुरुत्तरे।। मान कापि विमुचंति कुलीना जातु नापदि ॥ १५९३ ॥ विजयोदया-असिषे मार्ग। दुम्भिक्षे था दुर्भिक्षे घा। कंतारे अटव्यां पा। गाढे भये च । उपर्युपरि निपतितभये पा । रोगेहि घ अभिभूदा व्याधिमिर्वा अभिभूताः पाविजइंति कुलजा माण न बिजइति कुलप्रसूता मान । मूलारा-असिवे मार्यो । आगाढे उपर्युपरि निपतति सति । अनिवार्येण । अर्थ-मारी, दुर्भिक्ष, गहन अरण्य, पुनः पुनः भय प्राप्त होना, रोगोंसे पीडित होना इत्यादि प्रसंगपर कुलवान् मनुष्य अभिमान छोडते नहीं है. ण पियति मुरं ग य खेति गोमयं ण य पलंडुमादीय ॥ ण य कुम्वति विकम्मं तहेव अण्णपि लज्जणय ॥ १५३३ ।। सेवते मघगोमांसपलांडादि न मानिनः ॥ कर्मान्यदपि कृच्छ्रेऽपि लज्जनीयं न कुर्वते ॥ १५९१ ॥ १४१४
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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