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________________ मूलाचार प्रदीप ] ( ३८४) नवम अधिकार को पढ़ले तो भी उससे कोई लाभ नहीं होता क्योंकि बिना चारित्र के वह संसाररूपी समुद्र में ही डूबता है ॥२५०२-२५०३॥ मृमिरज कैसे संसार समान से पार होते हैं.माननिर्जीविकेनानध्यानवातेन धोधनाः । चारित्रपोतमारूढास्तरन्त्याशुभवार्णवम् ।।२५०४॥ अर्थ-जो बुद्धिमान पुरुष चारित्ररूपी जहाज पर सवार हो जाते हैं वे ज्ञानरूपी पतवार से और ध्यानरूपी वायु से बहुत ही शीघ्र संसाररूपी समुद्र के पार हो जाते हैं ॥२५०४॥ ज्ञान, ध्यान, संयम के कार्य का निर्देशशानं प्रकाशकं विश्व सत्वातत्वादिकर्मणाम् । दुष्कर्मनाशकंध्यानं संयमः संयरप्रदः ॥२५०५॥ अर्थ-ज्ञान समस्त तस्वों को, प्रतत्त्वों को और कर्मों को प्रकाशित करता है। तथा ध्यान अशुभ कर्मों का नाश करता है और संयम प्राते हुए कर्मों को रोकता है। ॥२५०५।। ज्ञान, ध्यान, संयम की एकता होनेपर नियम से मोक्ष होता हैसंघोगेसस्यमीषां च त्रयाणां स्यान्महामुनेः । विनेनशासने मोक्षो मान्यथाभवकोटिभिः ।।२५०६॥ अर्थ-यदि किसी महा मुनि के ज्ञान ध्यान और संयम इन तीनों का एक साथ संयोग हो जाय तो भगवान जिनेन्द्रदेवके शासन में उसी मुनि को मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है बिना इन तीनों के मिले करोड़ों भवों में भी कभी मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो सकती ।।२५०६॥ चारित्रादिक के बिना जिनलिंग धारण करना व्यर्थ हैचारित्रवजितम् ज्ञानं लिंगग्रहणमूजितम्। विधासंयमहीनं च सपोदर्शनरगम् ॥२५०७॥ योजः करोति कुर्यात् स केवलं हि निरर्थकम् । यतो न निर्जरा मोझो नास्य कत्रिवालवचित् ।। अर्थ-जो नजानी चारित्रहीन ज्ञानको धारण करता है और दोनों प्रकार के संयम से रहित तथा तप और सम्यग्दर्शन से रहित उत्कृष्ट जिन लिंग धारण करता है वह निरर्थक ही जिन लिंग धारण करता है क्योंकि बिना चारित्र के निरंतर कर्मों का आस्रव होता रहता है इसलिये उनके न तो कर्मोंकी निर्जरा हो सकती है और न मोक्ष हो सकती है ॥२५०७-२५०८॥
SR No.090288
Book TitleMulachar Pradip
Original Sutra AuthorN/A
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages544
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size14 MB
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