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________________ सप्तमोधिकार मंगलाचरण श्रीमतस्तीर्थनाषांश्वसमाचारग्ररूपकान् । सिद्धान्साधूनजगत्पूज्यान गुणाधोनोमिसिद्धये ॥४६॥ __ अर्थ---मैं अपने कार्य की सिद्धि के लिये अंतरंग बहिरंग विभूतिसे सुशोभित और समाचार नीतिको प्ररूपण करनेवाले तीर्थकर भगवान को नमस्कार करता हूं, जगतपूज्य सिद्धों को नमस्कार करता हूं और गुणों के समुद्र ऐसे साधुओं को नमस्कार करता हूं ॥२१४६॥ समाचार के स्वरूप का निर्देशपथ य: सम्धगाचारः समानः सर्वयोगिनाम् । समजालोथवा येसमाचाराण्यमेव सम् ।।२१५०॥ अर्थ-~जो समस्त मुनियों को समान रीति से पालन करने पड़े ऐसे श्रेष्ठ आचरणों को समाचार कहते हैं । ऐसे समाचारों को अम आगे इस अध्याय में निरूपण करते हैं ।।२१५०॥ समाचार के मूल उत्सर भेद का कथनएक: प्रोधिकः संगोद्वितीय पविभागिकः । इत्यत्र स समाचारोद्विधोक्तः श्रीजिनागमे ।।२१५१।। प्रोधिकोऽपिसमाचारो दशभेदोजिनाधिपः । मलोऽनेकविधीमूलाचारेपषिमागिमः ॥२१५२।। अर्थ-यह समाचार भगवान जिनेन्द्र देव के प्रागममें दो प्रकार का बतलाया है । एक औधिक और दूसरा पदविभागिक । भगवान जिनेन्द्रदेव ने औधिक समाचार के वश भेष बतलाये हैं और मूलाधार प्रयों में पविभागिक के अनेक भेद बतलाये हैं ॥२१५१-२१५२॥ प्रोधिक समाचार के इच्छाकारादि भेदइच्छाकारो हि मिध्याकारस्तथाकार प्रासिका। मिषेधिका किलापृच्छाप्रतिपृच्छा च छन्दनम् ।। सनिम्नत्रण एच वायोपसंपयोगिनामिमे । बशमेवा:समाख्याता प्रोधिकस्य समासत: ।।२१५४।। अर्थ-इच्छाकार, मिथ्याकार, तथाकार, मासिका, निषेधिका, प्रापृच्छा, प्रतिपृच्छा, छंदन, सनिमंत्रण और उपसंपत् ये पौधिक समाचार के संक्षेप से वश भेद कहलाते हैं ।।२१५३-२१५४॥
SR No.090288
Book TitleMulachar Pradip
Original Sutra AuthorN/A
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages544
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size14 MB
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