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________________ प्रशुख सर्वतो नुनी , पुरुषों २ पृष्ठ पंक्ति शुख | पृष्ठ परिस गुट मशुद्ध २४२ ६ प्रभाव प्रमाण ३०४ २५ सबतो २४३ ७ मनुष्यगतिप्रायोग्या- मनुष्यगतिमायोग्या- ३०६ २१ अपना प्रात्मा प्रपनी पात्मा नुपूर्वी ३०४२ दुषेः सुधैः २४ २४ माचार्यते पापयंसे ३१. संयोग के संयोग के लिये २५. १२ तपश्चरण का तपश्चरम का मद ३१५ २२ मुद्गलाना पुदगलानी नहीं करते थे यही ३१५ १८ मधीन माधीन समझकर प्रसरता ] पूर्वक तपके मदको १६ ६ नीम नीम काजी छोड़ देना चाहिये ३१० १६ मारतहतक: मन्तमुहूतंक: २५३ ४ प्रास्त्रशुभम् प्राक्तीशुभम् ३१५ सक्दन्दासिगं सर्वचन्दातिग २१३ १८ सम्पन्दन महात्म्य सम्यग्दर्शन के ११९ २० बितायावीचारेण । विसकाम्यावीचारेगा माहात्म्य ३२० ६ संयोगी सयोगी २५७ १२ जान जाय आना जाय ३२५ ८ पूत्रों २६२ १६ शास्त्रों ३२५ १६ रसहारोषधाप रसाहारोपधार्थ २६८ २१ मोहायिक मोहादिक ३२६ . प्राणिसंगम प्राणी संयम २७० - गस्ति गुप्ति ३२६ २६ सम्मूछन सम्मन्छन २७० ११ सर्वथा सर्वदा ३२७ ९ अचलात्मनाम् बंधनात्मनाम् २७१ ७-८ इस संसार में एक इस संसार में एक । ३३० २२ सनिमत्रण सनिमंत्रण मनोगप्ति का परम मनोगुप्ति का ही | ३३१ ८ उपसम्पद उवसम्पद पालन करना चाहिये पालन करना चाहिये २७६ १६ निमन निर्मल ३३४ ९ काय सिद्धये कार्य सिद्धये २७८ १९ इहोजितः बहोजितः ३३६ ७ युष्मस्पद प्रसादेन युष्मत्पाद प्रसादेन २८१ २३ मममोंदर्य प्रमोदयं १४१ ८ को। वृद्धि की बुद्धि २८२ २५ गः या ३४२ १८ सचिनावित्तमिश्र सचिताचित्तमिदं २५३ ४ यतक्षः चतर १४४ ५ प्रति पादि २५६१ दश स्मकम् देशात्मकम् ३४६ २३ अवकाश मावास २८७ १३ प्राकृतिक प्राकतिका २४८ २१ ग्रहीतु गृहीतु २९३ २८ प्रतिबदनां सहाबिलम् प्रतिबन्दना ३५६ ८ गच्छवियायिनः जगच्छद्धिदायिनः सहाशिल ३६१ २४ वसतिका शुद्ध असतिका सुद्धि ३०४ ५ लोक लोम | ३६२ २० वा पहुंच जाते हैं मान पहुंचाते हैं - ३६६ ३ ३ ३३६३३६: ३ [ ५६ ]
SR No.090288
Book TitleMulachar Pradip
Original Sutra AuthorN/A
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages544
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size14 MB
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