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________________ महापुराण [ ३८.९.१ गुरुचरणारविंदु सेवेपिणु जायउ परमभिक्खु तउ लेप्पिणु । धीयरायवयणेण विणायन पालइ पंचमहन्वयमाय । अप्पाणउ तिहि गुत्तिहि मावई णीरसुबह णिसिहि ण सोवइ । वेजावच करइ मुणिणाह बालई, वुड्ढई रुययदेहह। धम्मु अहिंसालकखणु अक्खह मित्त वि सन्त वि सम जि णिरिक्खइ। आगच्छंतुबसगु समिच्छाइ लंबियकरु उन्मभउ अच्छा। दसमसय सुद्धसंत ण साउद सप वि लग्ग देहि णर फेडद । दमणसुद्धिविण उ आराहर सहइ परीसह इंदिय साहइ । विकहउ ण कारण रुसद्द ण हमइ भीसणि णिजणि कायणि रिसइ । गाणु गिरंतक तेणमसियउ कम्मु अहम्मकारि संपुसियज । एम घोम तवचरणु चरेपिपणु तित्थयरत्त णा बंधेपिपणु । घता-तेलोकचक्कसंखोहणई मुकम्माई समजिवि ।। मुनिक हिस्सा लिहि करिवि चित्त समत्ति पिउंजिचि ॥२॥ १० तेत्तीसंबुहि आ उपमाणइ पंचागुंतरविजयविमाणइ। किं वणवि पुण्णेप्पणउ त्थ मेततणु ससहरबण उ । गुरुके चरण-कमलोंको सेवा कर वह तप ग्रहण कर परम भिक्षु हो गया। वह वीतरागके वचनोंसे ज्ञात, पांच महानतोंकी पांच-पांच भावनाओं का पालन करता है, वह स्वयंको तीन गुतियोंसे भावित करता है, नीरस भोजन करता है, रातमें नहीं सोता है। रोगसे जिनका शरीर आहत है ऐसे बाल और वृद्ध मुनिस्वामियोंको वैयावृत्य ( सेवा ) करता है, अहिंसा लक्षणवाले धर्मको व्याख्या करता है, जो मित्र और शत्रुको समानरूपसे देखता है, आते हुए उपसर्गकी सहन करता है, हाथ ऊपर कर खगासन में स्थित रहता है। काटते हुए डॉम और मच्छरोंको नहीं भगाता, शरीर पर लगे हुए सांपको भी नहीं हटाता, दर्शनविशुद्धि और विनयको आराधना करता है, परीषहोंको सहन करता है, और इन्द्रियोंको सिद्ध करता है, विकथा नहीं कहता, न क्रोध करता है और न हसता है, भीषण और निर्जन काननमें निवा५ करता है। इस प्रकार उसने निरन्तर ज्ञानका अभ्यास किया, और अधर्म करने वाले कर्मका नाश कर दिया इस प्रकार घोर तपश्चरण कर तीर्थंकर प्रकृतिका बंधकर । घना-त्रिलोकचक्रको क्षुब्ध करनेवाले शुभ कर्मोंका अर्जनकर, अनशन विधिकर और चिनको सभ्यवत्वमें नियोजित कर वह मृत्युको प्राप्त हुए ॥५|| तैंतीम सागर आयु प्रमाणवाले पांचवें विजयनामक अनुन र विमानमें वह उत्पन्न हुए। पुण्यसे उत्पन्न उनका क्या वणन करूं! उनका एक हाथ प्रमाण शरीर नन्द्रमा के रंग का प्रतिकार९.१. P विणाय 3 ! २. । गोवइ । ३. AP जेमइ। ४. A विजावच्चु । ५. A सम्। ६. P उपभ3 । ७. A! झाडइ : ८. A विकाउ कह ण हपइ 'ण कमः । ६. NP अणतण । १०. १. A तीसंवति । २. AP पंना पुनरि। ३. APणमि। ४. . पुणेा पाउ: P Tण पलाउ 19. A हल्पमेनन ।
SR No.090275
Book TitleMahapurana Part 3
Original Sutra AuthorPushpadant
AuthorP L Vaidya
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2001
Total Pages522
LanguageHindi, Apbhramsa
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size15 MB
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