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________________ २८ मवनजुद्ध काव्य ___ रहसिउ अंग न माश्यइ जीने राणे राइ" (58) रौद्र रस जब मदन अपनी पत्नी रति द्वारा अपमानित होता है तब रौद्र रस का समुचित संचार हुआ है । जैसे रोम रोम उद्धसिय भृकुटि चाडिय पिल्लाडिय । गुरणायउ जिम सिंघु घालि बलु लिय अंगाडिय । विसहरु जिय फुकरिउ लहरि ले कोपह चडियउ । जिम पावस घणु मत्तु तिम सु गजिवि गडवडियउ । (68) इसमें स्थायी भाव क्रोध, शत्रु विवेक आलम्बन विभाव, रति के शब्द उद्दीपन विभाव, आश्रय मदन, रोम-रोम का फड़क उठना, भृकुटि टेढ़ी हो जाना, जोर से गुर्राना आदि अनुभाष और अमर्ष, गर्व आदि संचारी भावों से परिपुष्ट रौद्ररस का सुन्दर परिपाक हुआ है । ___ इसी प्रकार मोह के वर्णन में भी रौद्र रस की सुन्दर अभिव्यंजना हुई हैं । यथा "करि रत्त नयण बहु दंत पीसि । अणिहाउ पडिउ जणु टूटि सीसि (118) ___ "बहु रुद्द रूपि हुई डहिउ आपु । सो करइ बहुत जीवह संतापु (119) चडिउ कोपि कंदप्पु उप्पबलि अण्णु न मण्णई | कुंदइ कुरलइ तसइ हसइ सुभटह अवगण्णइ ।। (136) वीर-रस प्रताप, विनय, अध्यवसाय, स्वत्व, अविषाद आदि विभावों से उत्साह स्थायी भाव का वीररस में परिपाक होता है । ___मंदन और ऋषभदेव के युद्ध प्रसंग में वीर-रस की सफल निष्पत्ति हुई है । अहंकार के वशीभूत होकर मदन ने आदीश्वर के ऊपर चढ़ाई की और अपने वीरों को उत्साहित करने हेतु विविध प्रकार की दर्पोक्तियों का प्रयोग किया है । प्रस्तुत कृति में सं० पद्य 101 से लेकर 135 तक वीर-रस की अभिव्यंजना हई है । यथा वे अणिय जोडि जुट्टिय भुवाल । तह पडहिं खग्ग जणु अगणिझाल । तेय लेस गोले मिलति । ते सीय लेस झाला झलंति (130) वे दोनउं डुक्किय काल कंधि । बे भिडिय रणंगणि फोज बंधि (129) भयानक-रस भयप्रद दृश्य को देखने-सुनने, स्मरण करने अथवा उसकी प्रतीनि से उत्पत्र भय भयानक रस की व्यंजना करता है।
SR No.090267
Book TitleMadanjuddh Kavya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBuchraj Mahakavi, Vidyavati Jain
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages176
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size3 MB
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