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________________ प्रस्तावना तत्पश्चान कवि ने बतलाया है कि शरीररूपी गढ़ के भीतर चेतन राजा निवास करता है, मन नामका उसका महामन्त्री है : प्रवृत्ति और निवत्ति नापकी उम्मकी दो रानियाँ हैं / प्रवृत्ति से मोह नामक पुत्र ने जन्म लिया और निवृत्ति से विवेक ने / राजकुमार मोह की रानी का नाम माया है / उसका मन्मथ नामका पुत्र उत्पन्न हआ / विवेक के ऊपर मदन ने चढ़ाई की, तब विवेक आदीवर से मिला और आदीश्वर ने अपनी गुणरूपी सेना लेकर मदन और मोह के साथ संग्राम किया और उसे अपने ध्यानरूपी सर्प से पराजित कर दिया / इस प्रकार चेतन परतन्त्रता से छूट कर ज्ञानी बन गया तब केवलज्ञानरूपी सूर्य प्रकट हुआ है इस प्रकार मोक्ष का मार्ग प्रशस्त हुआ / इसके पश्चात् कवि ने 21 पद्यों में प्रभु के उपदेश तथा शिवपद आदि के स्वरूप का वर्णन किया है। "मयणपराजयचरिउ' की कथावस्तु इससे कुछ भिन्न है / उसमें बतलाया गया है कि भवनगर पट्टन का राजा मकरध्वज अपनी रति और प्रीति नामकी दो नारियों के साथ निवास करता था / उसका मोह नामका महामंत्री था / एक दिन राजा ने सभाभवन में पूछा कि त्रिभुवन में कोई ऐसी महिला है, जो मुझे न चाहती हो ? तब रति उसे बतलाती है कि आधभूमि में रहने वाली सिद्धिनामक रमणी आपको नहीं चाहनी / उसके ऐसा कहने पर कामदेव ने रति से उसे लाकर मिलाने के लिए दूती-कर्म करने को कहा / तब मोह ने राजा मदन से कहा कि सिद्धि रमणी का जिनेन्द्र से विवाह होना निश्चित हो गया है / इसलिए उसने दून द्वारा जिनेन्द्र के पास सन्देश भेजा कि से आकर या नो हमारी सेवा करें या युद्ध के लिए तैयार हो जावें / इसी कारण मदन और जिनेन्द्र का युद्ध होता है, जिसमें मदन पराजित होता है और जिनेन्द्र का सिद्धि से विवाह सम्पन्न हो जाता है / मयणजुद्ध में काव्यात्मकता कवि बूचराज के अनुसार प्रस्तुत कृति का नाम मयणजुद्ध अथवा मदनजुद्ध है जो अपनी अभिव्यक्ति में पूर्णरूपेण सटीक है / उक्त ग्रन्थ की आदि और अन्त्य दोनों पुष्पिकाओं में यही दोनों नाम प्राप्त होते हैं / यद्यपि कवि ने इसके आगे काव्य, कव्व, वृत्त या वृत्त कुछ भी नहीं लगाया है तथापि यह एक काव्य-रचना है और काव्य-गुणो से भरपूर है / इसका वर्ण्य-विषय अध्याय, सर्ग या सन्धियों में विभक्त नहीं, फिर भी वह विविध प्रकार के छन्दों मे चित्रित होने के कारण उसमें एकरसता नहीं आ पाई है / इसकी सम्पूर्ण कथावस्तु भावात्मक और रसप्रधान है / उसमें प्रसंगानुकूल प्रायः सभी रसों का विधान किया गया है / वह एक आध्यात्मिक रचना होते हुए भी कात्र्य-गुणों से युक्त है / सभी दृष्टियों से अभ्ययन करने से यह स्पष्ट
SR No.090267
Book TitleMadanjuddh Kavya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBuchraj Mahakavi, Vidyavati Jain
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages176
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size3 MB
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