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________________ तृतीय परिच्छेद समुच्छ्रितानेव तरून् प्रबाधते महान् [ ९१ महद्भिश्च करोति विग्रहम् ॥ १॥ " तथा च " गण्डस्थलेषु मदवारिषु लौल्यलुब्धमत्तभ्रमद्भ्रमरपादतलाहतोऽपि । कोपं न गच्छति नितान्तबलोऽपि नागः स्वल्पे बले न बलवान् परिकोपमेति ||२|| " [ तृतीय परिच्छेद ] * १ संयमसे अपमानित होनेपर राग और द्वेष बड़ े क्रुद्ध हुए। वे वहाँसे चलकर सोधे कामदेव के पास पहुँचे और उसे प्रणाम करके बैठ गये । राग-द्वेष के पहुंचते ही कामने पूछा- हाँ भाई, तुमने जिनराजके पास जाकर क्या कहा जिनराजने क्या उत्तर दिया और उसकी युद्ध सामग्री किस प्रकार की है ? कामदेव के इस प्रकार पूछनेपर राग-द्वेष कहने लगे :-- राजन्, यह बात हमसे न पूछिए । जिनराज अत्यन्त अगम्य, अलक्ष्य और महान् बलवान् है । वह ग्रापको कुछ नहीं समझता है । हम लोगोंने उसे साम, दाम दण्ड और भेद - सब तरहसे समझाया, पर अपनी शक्तिके अभिमान में उसे किसीकी परवाह नहीं है । इतना ही नहीं, जिनराजने यह भी कहा है कि- 'मैं उस अधमकी सेवा नहीं कर सकता और प्रात काल मुझे ससैन्य कामको पराजित करना है ।' पाल्यवीर ने कहा- राग-द्व ेष, आप लोग यह क्या अप्रिय बात कह रहे हैं ? क्या आप हमारी सेनाके अन्तर्गत नहीं थे जो आपने इस प्रकार पराभवका घूंट पी लिया ?
SR No.090266
Book TitleMadan Parajay
Original Sutra AuthorNagdev
AuthorLalbahaddur Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages195
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size3 MB
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