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________________ तृतीयाधिकार १०४. प्रश्न : विमान एवं वैमानिक देव क्या हैं ? उत्तर : जिनने रहने काल अनेको विशेष गुमनाली मानते हैं, उन्हें विमान कहते हैं एवं उन विमानों में रहने वाले देवों को वैमानिक देव कहते हैं १०५. प्रश्न : वैमानिक देवों के कितने और कौन-कौन से भेद उत्तर : वैमानिक देवों के दो भेद हैं। (१) कल्पोपपन्न, (२) कल्पातीत । कल्पोपपन्न : इन्द्र सामानिक आदि इस प्रकार की कल्पनाएँ जिनमें पाई जायें वे कल्पोपपन्न कहलाते हैं। सौधर्म स्वर्ग से अच्युत स्वर्ग पर्यन्त के देव कल्पोपपन्न हैं। कल्पातीत : जहाँ पर इन्द्र आदि की कल्पना नहीं है, सभी “अहमिन्द्र'' हैं, वे कल्पातीत हैं । नव ग्रैवेयक, नव अनुदिश और पाँच अनुत्तर इनकी कल्पातीत संज्ञा है। १०६. प्रश्न : स्वर्ग कितने हैं, इनके नाम क्या हैं एवं इनका अवस्थान कहाँ पर है ? उत्तर : स्वर्ग सोलह हैं। १. सौधर्म, २. ऐशान, ३. सानत्कुमार, ४. माहेन्द्र, ५, ब्रह्म, ६. ब्रह्मोत्तर, ७. लान्तव, ८, कापिष्ठ,
SR No.090247
Book TitleKarananuyoga Part 3
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPannalal Jain
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages147
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Agam, Canon, H000, H015, & agam_related_other_literature
File Size2 MB
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