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________________ देने से नवम् गुणस्थान में उदय योग्य ६६ प्रकृतियाँ हैं । पिछले अनुदय की ५० प्रकृतियों में उदय व्युच्छित्ति की ६ मिला देने से नवम् गुणस्थान में अनुदय योग्य ५६ प्रकृतियाँ होती हैं और ६ की उदय व्युच्छित्ति है। नवम् गुणस्थान की उदय योग्य ६६ प्रकृतियों में से उदय व्युच्छित्ति की ६ प्रकृतियाँ कम हो जाने से दशम् गुणस्थान में उदय योग्य ६० प्रकृतियाँ हैं। पिछले अनुदय की ५६ प्रकृतियों में उदय व्युच्छित्ति की ६ प्रकृतियाँ मिलाने से ६२ प्रकृतियाँ अनुदय योग्य हैं और १ की उदय व्युच्छित्ति है। दशम् गुणस्थान की उदय योग्य ६० प्रकृतियों में से उदय व्युच्छित्ति की १ प्रकृति कम हो जाने से एकादश गुणस्थान में उदय योग्य ५६ प्रकृतियाँ हैं। पिछले अनुदय की ६२ प्रकृतियों में उदय व्युच्छित्ति की १ प्रकृति मिल जाने से ६३ प्रकृतियाँ अनुदय योग्य हैं। २ की उदय व्युच्छित्ति है। एकादश गुणस्थान की उदय योग्य ५६ प्रकृतियों में से उदय व्युच्छित्ति की २ प्रकृतियाँ कम कर देने से द्वादश गुणस्थान में उदय योग्य ५७ प्रकृतियाँ हैं । पिछले अनुदय की ६३ प्रकृतियों में उदय व्युच्छित्ति की २ प्रकृतियाँ मिल जाने से ६५ प्रकृतियाँ अनुदय योग्य हैं और १६ की उदय व्युच्छित्ति है। द्वादश गुणस्थान की (UE)
SR No.090246
Book TitleKarananuyoga Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPannalal Jain
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages125
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Agam, Canon, & agam_related_other_literature
File Size1 MB
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