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________________ १५६. प्रश्न : अंगबाह्य के अक्षरों का प्रमाण क्या है ? उत्तर : अंगबाह्य के अक्षरों का प्रमाण आठ करोड़ एक लाख, आठ हजार एक सौ पचहत्तर (८,०१,०८, १७५) है। इतने से एक पर नहीं बनता है, अतः इसे अंगबाह्य कहते हैं । १५७ प्रश्न: अवधिज्ञान किसे कहते हैं ? उत्तर : अवधिज्ञानावरण कर्म के क्षयोपशम से द्रव्य-क्षेत्र - काल - भाव की अपेक्षा जिसके विषय की सीमा हो उसे अवधिज्ञान कहते हैं । इस ज्ञान का धारक जीव इन्द्रियों तथा प्रकाश आदि की सहायता के बिना ही अपने विषयक्षेत्र में स्थितरूपी पदार्थ को जानता है। १५८. प्रश्न: अवधिज्ञान के कितने भेद हैं ? उत्तर : अवधिज्ञान के दो भेद है- १. भवप्रत्यय : जो भव के निमित्त से होता है, उसे भवप्रत्यय अवधिज्ञान कहते हैं। यह ज्ञान देव, नारकी और तीर्थंकर के होता है तथा सर्वांग से उत्पन्न होता है । २. गुण- प्रत्यय : जो सम्यग्दर्शन और तपश्चरणादि गुणों के निमित्त से होता है, उसे गुणप्रत्यय अवधिज्ञान कहते हैं। यह ज्ञान किन्हीं पर्याप्त मनुष्यों तथा संज्ञी पंचेन्द्रिय तिर्यचों के होता है सबके नहीं ( 50 )
SR No.090245
Book TitleKarananuyoga Part 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPannalal Jain
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages149
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Agam, Canon, H000, H015, & agam_related_other_literature
File Size2 MB
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