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________________ ३९८ सप्ततिका प्रकरण ये हानि रूप छह स्थान हैं । वृद्धि की अपेक्षा छह स्थान इस प्रकार हैं—१. अनंत भागवृद्धिः २. असंख्यात भागवृद्धि, ३. संख्यात भागति ४. संख्यात गुणवृधि, ५. असंख्मास गुणवृद्धि और ६. अन्त गुणवृद्धि । ___इन षस्थानों का आशय यह है कि जब हम एक जीव की अपेक्षा विचार करते हैं तब पहले समय के परिणामों से दूसरे समय के परिणाम अनन्तगुणी विशुद्धि को लिये हुए प्राप्त होते हैं और जब नाना जीवों की अपेक्षा से विचार करते हैं तब एक समयवर्ती नाना जीवों के परिणाम छह स्थान पतित प्राप्त होते हैं तथा यथाप्रवृत्तकरण के पहले समय में माना जीवों की अपेक्षा जितने परिणाम होते हैं, उससे दूसरे समय के परिणाम विशेषाधिक होते हैं, दूसरे समय से तीसरे समय में और तीसरे समय से चौथे समय में इसी प्रकार यथाप्रवृत्तकरण के चरम समय तक विशेषाधिक-विशेषाधिक परिणाम होते हैं । इसमें भी पहले समय मे जघन्य विशुद्धि सबसे थोड़ी होती है, उससे दूसरे समय में जघन्य विशुद्धि अभंतगुणी होती है, उससे तीसरे सार में जघन्य विशुद्धि अनंतगुणी होती है । इस प्रकार यशाप्रवृत्तकरण के संख्यातवे भाग के प्राप्त होने तक यही क्रम चलता रहता है । पर यहाँ जो जघन्य विशुद्धि प्राप्त होती है, उससे पहले समय की उत्कृष्ट विशुद्धि अनंतगुणी होती है। ___ तदनन्तर पहले समय की उत्कृष्ट विशुद्धि से यथाप्रवृत्तकरण के संख्यात भाग के अगले समय की जघन्य विशुद्धि अनंतगुणी होती है। पुनः इससे दूसरे समय की उत्कृष्ट विशुद्धि अनंत गुणी होती है । पुनः उससे यथाप्रवृत्तकरण के संख्यातवें भाग के आगे दूसरे समय की जघन्य विशुद्धि अनंतगुणी होती है। इस प्रकार यथाप्रवृत्तकरण के अन्तिम समय में जघन्य विशुद्धिस्थान के प्राप्त होने तक ऊपर और नीचे एक-एक विशुद्धिस्थान को अनंतगुणा करते जानना चाहिये, पर इसके आगे जितने विशुद्धिस्थान
SR No.090244
Book TitleKarmagrantha Part 6
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages573
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size9 MB
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