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________________ २३६ समूल- बांस की जड़ (मायाकषाय के एक भेद की उपमा ) बहर---- वज्रऋषभ नाराच संहनन -स्वीला वज T यज्ञरिसनाराय वचषभ नाराच संहनन वजनवग्ग - व्यंजनावग्रहः मतिज्ञान डोड़कर के बस -- वर्तमान वढमाणय - वर्धमान ( अवधिज्ञान का भेद विशेष ) वन-वाणव्यन्तर देव वणवणं नामकर्म यत्र वर्ण नामकर्म वस -- बैल अधीनता ; www. - वामन संस्थान वामण विजय (उण्य) – वैन्यि शरीर नामकर्म तथा वैक्रिय काययोग विजय- वैक्रिय अष्टक (वैक्रिय पारीर आदि आठ प्रकृतियाँ) दिग्ध - विघ्न, अन्तराय कर्म fare - विकलेन्द्रिय fareललिग विकलत्रिक BELLY www विजिणू छोड़कर विसि दरबान विमासा - परिभाषा-संकेत विमल विमलमति मनः पर्यायशान ततीय कर्मप्रम्य: परिशिष्ट AWAA विवस्थ--- (विवज्जय-विवरीय) विपरीत, उल्टा दिवाग - विपाक, फल ( प्रभाव, असर)
SR No.090241
Book TitleKarmagrantha Part 3
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages267
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size4 MB
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