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________________ अन्धविस्वामिस्व विगम्बर कर्मसाहित्य का मन्तभ्य देवे वा वे मिस्से परतिरियआउन गुर्णवाहरे तम्मिस्से पत्थ १३७ पत्थि । देवाक ॥११॥ fer काययोग में देवर्गात के समान बंधविच्छेद आदि समझना चाहिए । क्रियमिश्र काययोग में सौधर्म ऐशान सम्बन्धी अपर्याप्त देवों के समान बंधयुति है, किन्तु उस मिश्र में ममुष्यायु और विषाणु का बन्ध नहीं होता है । आहारक काययोग में छठे गुणस्थान जैसा बन्धविच्छेद आदि होता है । आहारक मिश्रयोग में वायु का बन्ध नहीं होता है । कम्मे उराल मिस्स वाणावदुषि व हिंदी अयदे 1 कार्मण काययोग में वन्धविच्छेद आदि औदारिकमिव काययोग के सदृश हैं। लेकिन विमति में आयु का बन्ध न होने से मनुष्यायु तथा तिचायु- इन दो का भी नहीं होता है और वो गुणस्थान में नौ प्रकृतियों की व्युत होती है । वेद से आहारक मार्गणा पर्यन्त वेदादाहारोति य सगुणट्ठाणा मोचं तु ॥ ११६ ॥ वरिय सत्रसम्मै रसुरक्षाऊणि गस्थि नियमेण । frewriter raj वारंण हि तेउपम्मेसु ॥ १२० ॥ सुक्के सदर वामतिमबारसं च व अfe | कम्मेव अणाहारे बंधस्संतो मगंतो य ॥१२१॥ वेणा से लेकर आहारकमागंणा तक का कथन गुणस्थानों के साधारण कथन जैसा समझना चाहिए । लेकिन सम्यक्त्रमार्गणा तथा लेण्यामार्गणा को शुभलेश्याओं में और आहारमार्गणा की कुछ विशेषता है कि · मार्गेणा में सभी अर्थात् दोनों ही उप सम्यक्त्व जीवों के मनुष्यायु और वायु का बन्ध नहीं होता | Heereint में तेजोलेश्या वा के मिध्यात्व गुणस्थान की अन्त की नौ तथा पदमलेश्या वाले केमिया गुणस्वान की अन्य की बारह प्रकृतियों का बंध नहीं होता है। शुक्ललेश्या
SR No.090241
Book TitleKarmagrantha Part 3
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages267
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size4 MB
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