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________________ ( ३१ ) २. जाग्रत - इसमें अहं एवं ममत्व बुद्धि अल्पांश में जाग्रत होती है । ३. महाजाग्रत - इस भूमिका में आई व ममत्य बुद्धि दिशेने पुष्ट होती है। यह भूमिका मानव, देवममूह में मानी जा सकती है। ४. जाग्रतस्वप्न - इस भूमिका में जागते हुए भी भ्रम का समावेश होता है । जैसे एक चन्द्र के बदले दो दिखना, सीप में चांदी का भ्रम होना । इस भूमिका में भ्रम होने के कारण यह जाग्रतस्वान कहलाती है। ५. स्वप्न -- निद्रावस्था में आए हुए स्वप्न का जागने के पश्चात जो भान होता है, उसे स्वप्न भूमिका कहते हैं । ६. स्वप्नजाग्रत वर्षों तक प्रारम्भ रहे हुए स्वप्न का इसमें ममावेश होता है | शरीरपात हो जाने पर भी चलता रहता है । - ७. सुषुप्तक - प्रगाढ़ निद्रा जैसी अवस्था | इसमें जड़ जैमी स्थिति हो जाती है और कर्म मात्र वासना रूप में रहे हुए होते हैं । यह सात अज्ञानमय भूमिका के भेदों का सारांश है । इनमें तीसरी से सातवीं तक की भूमिकायें मानव निकाय में होती हैं । ज्ञानमय भूमिकाओं का रूप निम्न हैं १. शुभेच्छा- आत्मावलोकन की वंशग्ययुक्त इच्छा । २. विचारणा -- शास्त्र और सत्संगपूर्वक वैराग्याभ्यास के कारण सदाचार में प्रवृत्ति । ३. तनुमानसा - शुभेच्छा और विचारणा के कारण इन्द्रियविषयों में आसक्ति कम होना । ४. सत्त्वापत्ति - सत्य और शुद्ध आत्मा में स्थिर होना ।
SR No.090240
Book TitleKarmagrantha Part 2
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages251
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size4 MB
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