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________________ द्वितीय कर्मग्रन्थ : परिशिष्ट ६. अनिवृत्तिकरण मूल ८ २१३ उ० १४८ अंतिम १०३ सम्भवता की अपेक्षा १४८ उपशमश्रेणी में अनन्तानुबन्धीचतुष्क और नरक तिर्यंचायु की सत्ता न रहने पर १४८-६१४२ । उपशमश्रेणी में अनन्तानुबन्धीचतुष्क और दर्शनत्रिक की विसंयोजना व नरक तियचायु का अभाव होने से १४६ - ७ - २१३६ । क्षपक श्रेणी में भाग १ में - अनन्तानुबन्धी ४, दर्शनत्रिक, आयु तीन की सत्ता न रहने से । १४८ - १०१३८ भाग २ में - स्थावरद्विक, तिर्यचद्विक, नरकद्विक 1 आतप उद्योत स्त्यानद्धित्रिक, एकेन्द्रिय विकलेन्द्रियत्रिक, साधारण नामकर्म की सत्ता नहीं रहती १३८-१६= १२२ r भाग ३ में दूसरे भाग के अन्त में अप्रत्याख्याना -A प्रत्याख्यानावरण वरणचतुष्क, चतुरुक की सत्ता क्षय हो जाती है । १२२ -८० ११४ — भाग ४ में तीसरे भाग के अन्त में नपुंसकवेद का क्षय हो जाने से । ११४-१ ११३ भाग ५ में – बोथे भाग के अन्त में स्त्रीवेद का =
SR No.090240
Book TitleKarmagrantha Part 2
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages251
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size4 MB
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