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________________ ૪ होती है, किन्तु तत्काल ही यहाँ उसका बन्ध होने से सत्ता भी होती है। अतः सभी जीवों की अपेक्षा पूर्वबद्धायु वाले जीवों के १४८ प्रक्रतियों की सत्ता होती है । कर्मस्तव परिशिष्ट F अवद्धायु वालों को भी सभी जीवों की अपेक्षा से १४८ प्रकृतियों की सत्ता होती है। इसका कारण यह है कि चारों गतियों में आयुकर्म का बन्ध नहीं करने वाले ( अवन्धक) जीव होते हैं। अमुक एक गति की अपेक्षा से १४५ प्रकृतियों की सत्ता होती है । विशेष रूप से विचार करने पर इसके दस विभाग हो जाते हैं(१) तीर्थंकर नामकर्म की सत्ता वाला ( पूर्वचद्धायु) सादिमिथ्यात्वी, (२) तीर्थकर नामकर्म की सत्ता वाला (अबद्धायु) सादिमिध्यात्वी, (३) आहारकपक की पाव (पूर्व) सदिमिथ्यात्वी, (४) आहारकचतुष्क की सत्ता वाला (अबद्धायु) सादिमिथ्यात्वी, (५) तीर्थकरनामकर्म और आहारकचतुष्क की सत्तारहित ( पूर्वबद्धायु) सादिमिथ्यात्री, (६) तीर्थंकर नामकर्म और आहारकचतुष्क की सत्तारहित (reaायु) सादिमिथ्यात्वी, (७) तीर्थंकरनामकर्म और आहारकचतुहक की सत्तारहित सम्यक्त्वमोहनीय उद्वेलक (पूर्वबद्धायु) सादिमिध्यात्वी, (८) तीर्थंकर नामकर्म और आहारकचतुष्क की सत्तारहित सम्यक्त्वमोहनीय उद्वेलक ( अबद्धायु) सादिमिध्यात्वी, (६) तीर्थकरनामकर्म और महारकचतुष्क की सत्तारहित सम्यक्त्वमोहनीय और मिश्रमोहनीय उद्वेलक (पूर्वद्धायु) सादिमिध्यात्वी, तथा (१०) तीर्थंकरनामकर्म और आहारकचतुष्क की सत्तारहित सम्यक्त्वमोहनीय और मिश्रमोहनीय उद्वेल (अबद्धाय ) सादिमिध्यात्वी । जिनको तीर्थकर नामकर्म की सत्ता होती है, उनको आहरकचतुष्क की सत्ता इस मिथ्यात्व गुणस्थान में होती ही नहीं है। उक्त दस भेदों में सत्ता इस प्रकार समझनी चाहिए।
SR No.090240
Book TitleKarmagrantha Part 2
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages251
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size4 MB
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