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________________ कर्मस्तव परिशिष्ट उक्त कथन से यह स्पष्ट हो जाता है कि जिन गुणस्थानों में जितने निमित्त सम्भव हैं, उस उस गुणस्थान में उन निमित्तों से बँधने वाली सभी कर्म प्रकृतियों का बन्ध होता है । निमित्तों और उनसे बंधने वाली कर्मप्रकृतियों का विवरण इस प्रकार है (१) योग-निमित्तक - सातावेदनीय | १ - (२) सूक्ष्मसंप राय- सहकृत संश्लेज़निमित्तक - दर्शनावरण चतुष्क, ज्ञानावरणपंचक, अन्तरायपंचक, उच्चगोत्र, यशः कीर्तिनाम । १६ संक्लेशनिमित्तक--संज्वलन १२६ (३) अनिवृत्तिबादरसं वराय - सहकृत क्रोध, मान, माया, लोभ, पुरुषवेद । (४) अपूर्वकरण निवृति बादरसंपराय सहकृत संक्लेशनिमित्तक-हास्य, रति, जुगुप्सा, भय, निद्रा, प्रचला, देवगति, देवानुपूर्वी, पंचेन्द्रियजाति, शुभविहायोगति अस, बादर, पर्याप्त प्रत्येक, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, आत्रेय, वैक्रियशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरोर, वेक्रियअंगोपांग, समचतुरस्त्र संस्थान, निर्माण, वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, अगुरुल, उपधात पराघात, श्वासोच्छ्वास । ३३ ५. 1 (५) यथाप्रवृत्ति अप्रमावभाव सहकृत संक्लेशनिमित्तक – आहारकशरीर, आहारक अंगोपांग | (६) प्रमादभाष सहकृत संक्लेशनिमित्तक - शोक, अरति, अस्थिर, अशुभ, अयशःकीर्ति, असातावेदनीय देवायु । - の (७) प्रत्याख्यानीयकषाय सहकृत संक्लेशनिमित्तक - प्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया, लोभ I (८) अप्रत्याख्यानीय सहकृत संक्लेशनिमित्तक- अप्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया, लोभ, मनुष्यगति, मनुष्यानुपूर्वी, मनुष्यायु, ओदारिकशरीर, औदारिक अंगोपांग, वज्रऋषभनाराच संहनन । १० 1 2 H
SR No.090240
Book TitleKarmagrantha Part 2
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages251
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size4 MB
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