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________________ कर्मविपाक श्री शब्द का अर्थ है, लक्ष्मी। उसके दो भेद हैं—आन्तर और बाह्य। अनन्तज्ञान, अनन्तदर्शन, मागासुन. आमगादीर्य आदि जारसा के स्वाभाविक गुणों को अन्तरंग लक्ष्मी कहते हैं और (१) अशोकवृक्ष, (२) सुरपुष्पवृष्टि, (३) दिध्यध्वनि, (४) चामर, (५) आसन, (६) भामंडल, (७) दुन्दुभि, (८) आतपत्र' इन आठ महाप्रातिहार्यों को बाह्य लक्ष्मी कहते हैं। जब तीर्थङ्कर भगवान केवलज्ञान प्राप्त कर भव्य मुमुक्षु जीवों के प्रतिबोधनार्थ धर्मदेशना देते हैं तब देव, देवेन्द्र अपना भक्ति-प्रमोद प्रकट करने के लिए उक्त अष्ट प्राविहार्योंरूप बाह्य लक्ष्मी से युक्त समवसरण की रचना करते हैं। वीर --"ची--विशिष्टा, ई- लक्ष्मी, र- शति-स्वाति; आरमीयत्वेन गृहातीति वा वीरः।" अथवा "वी--विशेषे अनन्तज्ञानावि आस्मगुणान्, हर-हरयति प्रापयति वा वीरः।" यह वीर शब्द की व्युत्पत्ति-मूलक व्याख्या है। जिसका अर्थ है कि अनन्तज्ञान, दर्शन आदि आत्मा के असाधारण-विशेष गुणों को जो प्राप्त करने वाले हैं और दूसरों को भी इन आत्मिक गुणों को प्राप्त कराने में समर्थ सहयोगी बन सकते हैं, वे बीर कहलाते हैं । अथवा-विदारयति यरफर्म तपसा च विराजते । तपो वीर्येणयुक्तश्च तस्माद्वीर प्रति स्मृतः ।। अर्थात्-जिन्होंने कर्मों का विदारण- नाश किया है तथा तप से शोभायमान हैं तथा तपोवीर्य से संपन्न हैं उन्हें वीर कहते हैं। जिन-अयतीति जिनः । जिन्होंने स्वरूपोपलब्धि में बाधक राग, दष, मोह, काम, क्रोध आदि भावकों को एवं ज्ञानावरणादि रूप द्रव्यकों को जीत लिया है, उन्हें जिन कहते हैं। १ अशोकवृक्षः सुरपुष्पवृष्टिदिपध्वनिश्चामरमासनं च । भामण्डलं दुन्दुभिरातपत्रं सत्प्रातिहार्याणि जिनेश्वराणाम् ।।
SR No.090239
Book TitleKarmagrantha Part 1
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages271
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size4 MB
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