SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 63
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ समावेश हो जाता है; क्योंकि सम्यक्चारित्र में मनोनिग्रह, इन्द्रियजय, चित्तशुद्धि, समभाव और उनके लिए किये जाने वाले उपायों का समावेश होता है। मनोनिग्रह, इन्द्रिमजय आदि मात्त्विक कार्य कर्ममार्ग है और चित्त शुद्धि तथा उसके लिए की जाने वाली सत्प्रवृत्ति योगमार्ग है। इस तरह कर्ममार्ग और योगमार्ग का मिश्रण ही सम्यक्चारित्र है । सम्यग्दर्शन भक्तिमार्ग है; क्योंकि भक्ति में श्रद्धा का अंश प्रधान है और सम्यग्दर्शन भी श्रद्धारूप ही है । सम्यग्ज्ञान शानमार्ग है। इस प्रकार जैनदर्शन में बताये गये मोक्ष के तीन साधन सम्यग्दर्शन, ज्ञान तथा चारित्र-अन्य दर्शनों के सब साधनों का समुच्चय है। जैनदर्शन में कमंतत्त्व-विषयक विवेचना का सारांश जैनदर्शन में प्रत्येक कर्म को बध्यमान, सत् और उदयमान ये तीन अवस्थाएं मानी है। इन्हें क्रमशः बंध, सत्ता और उदय कहते हैं । अन्य दार्शनिकों ने भी इन तीन अवस्थाओं का भिन्न-भिन्न नामों से कथन किया है। जनशास्त्र में ज्ञानाबरणीय आदि रूप से कर्म का आठ तथा एकसौ अट्रावन भेदों में वर्गीकरण किया है और इनके द्वारा संसारी आत्मा की अनुभवसिद्ध भिन्न-भिन्न अवस्थाओं का जैसा खुलासा किया है, वैसा किसी अन्य दर्शन में नहीं किया गया है। पातंजलदर्शन में कर्म के जाति, आयू और भोग तीन तरह के विपाक बताये गये हैं, किन्तु जैनदर्शन में कर्म के सम्बन्ध में किये गये विचार के सामने यह वर्णन नाममात्र का है। ___आत्मा के साथ कर्म का बन्ध कैसे होता है ? किन-किन कारणों से होता है ? किस कारण से कर्म में कैसी शक्ति पैदा होती है ? कर्म अधिक-से-अधिक और कम-से-कम कितने समय तक आत्मा के साथ लगा रह सकता है ? आत्मा के साथ लगा हआ भी कर्म कितने समय तक विपाक देने में असमर्थ है ? विपाक का नियत समय भी बदला जा सकता है या नहीं ? यदि बदला जा सकता है तो उसके लिए कैसे यात्म-परिणाम अवश्यक हैं ? एक कर्म अन्यकर्मरूप कब बन सकता है ? उसकी बंधकालीन तीन-मन्द शक्तियाँ किस प्रकार बदली जा सकती हैं ? पीछे से विपाक देनेवाला कर्म पहले ही कब और किस प्रकार भोगा जा सकता है ? कितना भी बलवान फर्म क्यों न हो पर उसका विपाक शुद्ध आत्मिक परिणामों से कैसे रोक दिया जाता है ? कभी-कभी आत्मा के शतशः
SR No.090239
Book TitleKarmagrantha Part 1
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages271
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size4 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy