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उपशमन अवस्था में रहा हुआ कर्म उस अवस्था के समाप्त होते ही अपना कार्य प्रारम्भ कर देता है अर्थात् उदय में आकर फल प्रदान करना शुरू कर देता है।
(९) निसि-कर्म की उदारणा, संक्रमण आदि के सर्वथा अभाव की स्थिति को निर्धात कहते हैं। इस स्थिति में उद्वर्तना और अपवर्तना की संभावना रहती है।
(१०) निकाचन-इस अवस्था का अर्थ है कि कर्म का जिस रूप में बंध हुआ है, उसी रूप में उसे अनिवार्यतः भोगना । इस अवस्था का नाम नियति भी कह सकते हैं। किसी-किसी कर्म की यह अवस्था भी होती है ।
(१३) अबाध-कर्म का बंधने के बाद अमुक समय तक किसी प्रकार का फल न देना, अबाध अवस्था है। यह सत्ता का एक अंश है। फिर भी अबाध
और सत्ता में अन्तर है । बंध से लेकर निर्जीर्ण होने तक की अवस्था को सत्ता कहते हैं लेकिन अबाध अवस्था ऐसी सत्ता है जिसमें बद्ध कर्म यथारूप में बना रहता है । यह उदय से पूर्व की अवस्था है। इस अवस्था के काल को अबाधा काल कहत हैं।
अन्य-अन्य दार्शनिक परम्पराओं में उदय के लिए प्रारब्ध, सत्ता के लिए संचित, बंधन के लिए क्रियमाण, निकाचन के लिए निगल विपाकी, संक्रमण के लिए आवागमन, उपशमन के लिए तनु आदि शब्दों का प्रयोग उपलब्ध होना है।
बंध, उपय-उदीरणा, सत्ता का स्पष्टीकरण आठ कर्मों को १५८ उत्तरप्रकृतियां होती हैं। उनमें से बंध आदि में कितनी-कितनी प्रकृतियाँ होती हैं, इसका विशद वर्णन जैन-कर्मशास्त्रों में किया गया है। तदनुसार बंध में १२०, उदय और उदीरणा में १२२ और सत्ता में १५८ प्रकृतियां मानी गयी हैं।
उक्त कयन का स्पष्टीकरण यह है कि सत्ता में तो समस्त १५८ प्रकुतियाँ होती हैं, जबकि उदय और उदीरणा में १५ बंधन और ५ संघातन नामकर्म की २० प्रकृतियां अलग से नहीं गिनी जाती, किन्तु इनका औदारिक आदि