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________________ ( १८ ) उदय में आनेवाले कर्म-पुद्गल अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार फल देकर नष्ट हो जाते हैं । (४) जयोरणा - नियत समय से पूर्व कर्म का उदय में आना उदीरणा कहलाता है । जिस प्रकार प्रयत्न द्वारा नियत समय से पहले फल पकाये जा सकते हैं, उसी प्रकार प्रयत्नपूर्वक नियत समय से पहले बद्ध कर्मों को भोगा जा सकता है । सामान्यतया जिस कर्म का उदय चालु रहता है, उसके सजातीय कर्म की ही उदीरणा सम्भव होती है । (५) उवर्तना - बद्ध कर्मों की स्थिति और अनुभाग में भाव विशेष, अध्यवसाय विशेष के कारण वृद्धि हो जाना उद्वर्तना कहलाता है । इसको एंग भी कहते हैं ! (६) अपवर्तना - यह अवस्था उवर्तना से बिलकुल विपरीत है। बद्ध कर्मों की स्थिति तथा अनुभाग में अध्यवसाय - विशेष से कमी कर देने का नाम अपवर्तना है । इसका दूसरा नाम अपकर्षणा भी है । उवर्तना और अपवर्तना इन दोनों अवस्थाओं की मान्यता से यही सिद्ध होता है कि अध्यवसाय विशेष से किसी कर्म की स्थिति एवं फल की तीव्रतामन्दता में परिवर्तन भी हो सकता है । (७) संक्रमण - एक प्रकार के कमंपरमाणुओं की स्थिति आदि का दूसरे प्रकार के परमाओं की स्थिति आदि में परिवर्तन अथवा परिणमन होना संक्रमण कहलाना है । यह संक्रमण किसी एक मूल प्रकृति की उत्तरप्रकृतियों में ही होता है, विभिन्न मूल प्रकृतियों में नहीं । संक्रमण सजातीय प्रकृतियों में ही माना गया है, विजातीय प्रकृतियों में नहीं होता है । सजातीय प्रकृतियों के संक्रमण में भी कुछ अपवाद हैं, जैसे कि आयुकर्म की नरकायु आदि चारों आयुओं में परस्पर संक्रमण नहीं होता और न दर्शन मोहनीय तथा चारित्रमोहनीय में । (८) उपशमन - कर्म की जिस अवस्था में उदय, उदीरणा, निर्धाति और निकाचना सम्भव नहीं होती, उसे उपशमन कहते हैं ।
SR No.090239
Book TitleKarmagrantha Part 1
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages271
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size4 MB
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