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________________ प्रथम कर्मग्रन्थ ८५ का सीधा होना सम्भव नहीं हैं। इसी प्रकार अनन्तानुबन्धी माया के परिणाम होते हैं । संज्वलन लोभ - सहज ही छूटने वाली हल्दी के रंग के समान इस लोभ के परिणाम होते हैं । प्रत्याख्यानावरण लोभ- काजल के रंग के समान इस लोभ के परिणाम कुछ प्रयत्न से छूटते हैं। अप्रत्याख्यानावरण लोभ-गाड़ी के पहिये की कीचड़ के समान अति कठिनता से छूटने वाले परिणाम वाला होता है । अनन्तानुबन्धी लोभ-जैसे किरमित्री रंग किसी भी उपाय से नहीं छूटता है, वैसे ही इस प्रकार के लोभ के परिणाम उपाय करने पर भी नहीं छूटते हैं । इस प्रकार कषायमोहनीय के भेदों का निरूपण करने के अनन्तर आगे दो गाथाओं में नोकषामोहनीय के भेदों का वर्णन करते हैं । जस्सुवया होह जिए हास रई अरइ सोग भय कुच्छा | सनिमितमन्ना' वार्त इह हासाइमोहणियं ॥ २१ ॥ पुरिसित्थितदुभयं पक्ष अहिलासो जब्वसा हबद्द सोउ । धीनरनपुवेउदयो फुफुमतनगरदाहसमो ॥२२॥ गाथार्थ - जिस कर्म के उदय से कारणवश वा बिना कारण के 'अन्ना' बिना १. 'सनिमित्तमन्ना वा' - 'सनिमित्त ' - कार और कारण के इन दोनों में तात्कालिक बाह्य पदार्थ कारण - हों तो सकारण . और मात्र मानसिक विचार ही निमित हों तो अकारण बिना कारण के, ऐसा आशय 'सनिमित्ता' पद से विवक्षित किया गया है।
SR No.090239
Book TitleKarmagrantha Part 1
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages271
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size4 MB
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