SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 142
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ६२ कर्म विपाक उमे स्त्यानगृद्धि निद्रा (स्त्यानासंधातीभूता गृद्धिविनचिन्तितार्थ साधन विषयाऽभिकांक्षा यस्यां सा स्त्यानगृद्धिः ) कहते हैं । प्राकृत भाषा में स्वपान के स्थान पर 'द्ध' यह निपात हो जाता है । यदि बज्रऋषभनाराच संहनन वाले जीव को स्त्यान निद्रा का उदय हो तो उसमें बासुदेव के आधे बल के बराबर बल हो जाता है । इस निद्रा वाला जीव मरने पर नरक में जाता है । दर्शनrary कर्म भी देशघाती और सर्वघाती रूप में दो प्रकार का है। चक्षुदर्शनावरण, अचक्षुदर्शनावरण, अवधिदर्शनावरण देशघाती हैं और शेष छह प्रकृतियाँ सर्वपाती हैं। सर्वाती प्रकृतियों में केवलदर्शनावरण मुख्य है | इस प्रकार दर्शनावरण कर्म के नौ भेदों का कथन करने के अनन्तर अब वेदनीय कर्म का वर्णन करते हैं । aaनीय कर्म का स्त्ररूप । खेदनीय - जो कर्म इन्द्रियों के कराये, उसे वेदनीय कर्म कहते हैं लगी धार को चाटने के समान है। जन्य ऐन्द्रियक सुख - दुःख का अनुभव करता रहता है । वेदनीय कर्म के दो भेद हैं- सातावेदनीय, असातावेदनीय ।' १. (क) साया विषयों का अनुभव अर्थात् वेदन इसका स्वभाव तलवार की शहद इस कर्म के उदय से जीव विषय यमायाणि । — - प्रज्ञापना, पद २३, ७०२, सू० २६३ हियं । - उतराध्ययन, २०३३ ० ७ - तस्वार्थसूत्र, अ० सूत्र (ख) वेषणीयं यदुविहं सागमसायं च (ग) सदस 3
SR No.090239
Book TitleKarmagrantha Part 1
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages271
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size4 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy