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________________ * | ६७. नियंग्गतेर्लक्षणम् 1 यतस्तिर्यक्पयो भवति प्राणिनः सा तिर्यग्गतिः । [ ६८. मनुष्यगतेर्लक्षणम् | यतो मनुष्यपर्याय आत्मनो भवति सा मनुष्यगतिः । | ६९. देवगतेर्लक्षणम् ] कर्मप्रकृतिः यतो देवपर्यायो देहिनो भवति सा देवगतिः । [ ७०. गतेः सामान्यलक्षणम् 1 नारका विभवप्राप्ति मनहेतुर्वा गतिनामा । [ ७१. जातिनामकर्मणः पञ्च भेदा: ] एकद्वित्रिचतुः पचेन्द्रियभेदाज्जातिनाम पञ्चषा । ६७. तिर्यग्गतिका लक्षण जिसके कारण जीवकी निर्यन पर्याय होती है, वह तिर्यग्गति है | [६७ ६८ मनुष्यगतिका लक्षण जिसके कारण आत्माकी मनुष्यपर्याय होती है. वह मनुष्यगति है । ६१. देवगतिका लक्षण जिसके कारण प्राणीको देवपर्याय होती है, वह देवगति है । ७०. गति नाम कर्मका सामान्य लक्षण अथवा नारक आदि भवप्राप्तिके लिए गमनका कारण मति नाम कर्म है 1 ७१. जाति नाम कर्मके पांच भेद | एकेन्द्रिय द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय तथा पंचेन्द्रियके भेदसे जानि नाम कर्मके पाँच भेद है ।
SR No.090237
Book TitleKarmaprakruti
Original Sutra AuthorAbhaynanda Acharya
AuthorGokulchandra Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year
Total Pages88
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size1010 KB
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