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________________ ३४ जीवसमास देव- ऊर्ध्वलोक में रहने वाले देव आदि। मनुष्य, तिर्थच, नारक तथा देव की चर्चा हम पूर्व गाथाओं में कर चुके हैं। नोट- द्वीन्द्रिय- जिनके दो इन्द्रियाँ हैं- शरीर तथा मुख। प्रौन्द्रिय- जिनके तीन इन्द्रियाँ है- शरीर, पुख तथा नासिका। चतुरिन्द्रिय- जिनके चार इन्द्रियाँ है- शरीर, मुख, नासिका तथा अन्य। पंचेन्द्रिय-- जिनके पाँच इन्द्रियाँ - शरीर, मुख. नासिका, आँख तथा कान। कुलों की संख्या बारस सर प तिनि य सत्त य कुलकोडि सयसहस्साइं। नेपा पुखविदगागणिवाऊण व परिसंखा।।४।। कुलकोडिसषसहस्सा सतह य नव व अवीस छ । बोइंदियतेइंदियघाउरिदियहरियकायाणं ॥४१।। अद्वत्तेरस दर दर दस कुमकाउसहस्साई । जलयरपक्तिचउप्पयउरभुयसप्माण नव ति ।। ४२।। छब्बीसा पणबीसा सुरनेरहयाण सहसहस्साई । पारस य सयसहममा कुलकोडीणं मणुस्साणं ।।४३।। एगा कोडाकोडी सत्ताउई मवे सबसहस्सा । पन्नासं घ सहस्सा कुलकोडीओ मुणेपव्या ।। ४४।। गाथार्थ- पृथ्वीकाय, अपकाय, तेजस्काय और वायुकाय के फुलों की संख्या अनुक्रम से बारहलाख करोड़, सातलाख करोड़, तीनलाख करोड़ और सातलाख करोड़ जानना चाहिये। द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय. चतुरिन्द्रिय तथा वनस्पतिकाय के कुलों की संख्या क्रमश: सातलाख करोड़, आठलाख करोड़, नौलाख करोड़ तथा अट्ठासीलाख करोड़ जानना चाहिये। जलचर, खेचर, चतुष्पद, उरपरिसर्प तथा भुजपरिसर्प के कलों की संख्या क्रमश: साढ़े बारह लाख करोड़, बारह लाख करोड़, दस लाख करोड़, दस लाख करोड़ तथा नौ लाख करोड़ जानना चाहिये। देव, नारक तथा मनुष्य के कुलों की संख्या क्रमश: छब्बीस लाख करोड़, पच्चीस लाख करोड़ तथा बारह लाख करोड़ जाननी चाहिये। इस प्रकार समस्त कुलों की संख्या एक करोड़ सत्तानवें लाख पचास हजार (१९७,५००००) करोड़ जाननी चाहिये।
SR No.090232
Book TitleJivsamas
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSagarmal Jain
PublisherParshwanath Vidyapith
Publication Year1998
Total Pages285
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size5 MB
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