SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 213
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ( नवम्-सर्ग ) मायामो शिव देवोऽभूद भवा स्तहान पुण्यतः । श्रेष्ठिनो जीव देवस्य जिनदत्ताभिधः सुतः ॥ १ ॥ उपर्युक्त शिवदेव उस उत्तम दान के पुण्य से तुम जीवदेव श्रेष्ठी की पत्नी जिनदत्ता के गर्भ से जिनदत्त नाम के पुत्र हुए हो।। १ ।। प्राप्त स्वं तत एवासि सौख्यं सर्वाङ्ग गोचरम् । अथवा लभ्यते कि न पात्र दानेन देहिभिः ।। २ ॥ उसी पुण्य से तुम्हें सर्वाङ्ग सुखकर भोगोपभोग सम्पदा प्राप्त हुयी है । अथवा संसारी प्राणियों को उत्तम दान के प्रभाव से क्या प्राप्त नहीं होता ? सब कुछ प्राप्त होता है ।। २ ।। तासां पत्रानुरागण सर्व देवासि भाक्तिः । तेनान्यासु नते स्त्रीषु साभिलाष मभून्मनः ॥ ३ ॥ वे चारों कन्यायें भी योग्य प्रेमानुराग से अपने-अपने सद्भावानुसार सदैव विरक्त भाव से रहीं । सबका एक प्रकार परिणाम होने से अन्य स्त्रियों में उनका मन नहीं रमा ॥ ३ ।। जननी शया यश्च संक्लिष्टं हृदयं तदा । बिपाकास्य चावापि मध्येन) परंपरा ॥ ४ ॥ तुम्हारी माँ ने दान के प्रति शङ्का कर कुछ क्लिष्ट रूप मन किया था उस पाप के कारण स्वरूप मध्य में अनर्थ की परम्परा को प्राप्त हुयी ।। ४ ।। तबिरामे च सम्पन्न सम्पदो पर मुसमम् । कन्या चतुष्टयं तच्च स्वपरीणाम योगतः ॥ ५ ॥ किन्तु उस विपाक के अन्त में समस्त सम्पदा युत उत्तम पद प्राप्त किया । वे कन्याये भी अपने-अपने परिणामानुसार कन्याएँ हुयीं और तुम्हारे द्वारा विवाही गई ।। ५ ।। अम्पाया सिंहल द्वीपे रथनपुर पसने । चम्पायामेव सजातं नारी रत्न चतुष्टयम् ॥ ६ ॥ [ १८१
SR No.090230
Book TitleJindutta Charit
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorTonkwala, Mahendrakumar Shastri
PublisherDigambar Jain Vijaya Granth Prakashan Samiti
Publication Year
Total Pages232
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size4 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy