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________________ जिनदत्त कुमार सपरिवार-पत्नियां सहित इन दानों को कर अपने गार्हस्थ्य जीवन को सफल करता ॥ १४ ।। स प्रार्चनः प्रयाति स्म एवंणां च चतुष्टये। इष्टं जनं समादाय वन्धितु जिन पुगवान् ॥ १५ ॥ अष्टमी और चतुर्दशी प्रादि चारों पर्यों में अपने इष्ट जनों को । लेकर श्रेष्ठ जिनदेव की वन्दनार्थ जाता ।। १५ ।। पञ्च कल्याण भू भागान् मेक कुल शिलोच्चयान् । एति चानन्य भक्तया सौ चारषि यतीश्वरान् ।। १६ ।। अत्यन्त प्रगाढ भक्ति से पञ्च-कल्याणक भूमियों की वन्दना, मेरू, कुल, पर्वत मादि पर जाकर चारग ऋषिश्वरादि की वन्दना करने जाता ॥ १६ ॥ तथातिशय सम्पन्न दृष्ट्वा जनपदोप्यसौ। तं बभूव समस्तोऽपि जिनधर्म परायणः ॥ १७ ॥ इसके सातिशय धर्म कार्यों और भक्ति को देखकर समस्त जनपद भी जिनधर्म में परायण हो गये ।। १७ ।। गजास्य रथ घनना मन्यासामपि सम्पदाम् । जाता संख्या ग्रहेनास्य वीचीमामिव सागरे ।॥ १८ ॥ उसके घर में असंख्य रथ, घोड़े, हाथी, गाय आदि सम्पदा हो गयीं । जिस प्रकार सागर में असंख्य लहरे होती हैं उसी प्रकार नाना सम्पदाएँ हो गई ॥ १८ ।। ऋतयो पि वसन्ताधा: सकान्तस्य यथोचितं । भुजानस्य प्रयान्तस्य सुखं शारीर मानसम् ।। १६ ।। अपने प्रियतम के साथ भोग विलास करने वाली उन कमनियों को वसन्तादि ऋतुएँ भी अनुकूल हो गईं। शारीरिक और मानसिक सभी । प्रकार के सुखानुभव पूर्वक समय व्यतीत होने लगा ।। १६ ।। सुबत्त जय बत्तास्यो बिमलादि मसिः सुतौ । बसन्तलेखपा साधं सुप्रभं श्रीमती तथा ।। २०॥ १६० ]
SR No.090230
Book TitleJindutta Charit
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorTonkwala, Mahendrakumar Shastri
PublisherDigambar Jain Vijaya Granth Prakashan Samiti
Publication Year
Total Pages232
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size4 MB
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